सीबीएसई की तीन भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 23 भाषाओं के शिक्षक-किताबों पर उठाए सवाल
स्कूलों में बच्चों को तीन भाषाएं पढ़ाने की नई व्यवस्था अब सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने सीबीएसई की नीति को रद्द नहीं किया, लेकिन उसके लागू होने के तरीके पर गंभीर सवाल जरूर उठा दिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर बच्चों को 23 भाषाओं में विकल्प दिया जा रहा है तो क्या सीबीएसई से जुड़े स्कूलों के पास उन भाषाओं को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक और किताबें भी हैं? अदालत ने इस सवाल का जवाब मांगते हुए सीबीएसई से संसाधनों को लेकर रोडमैप तैयार करने को कहा है।मामला केवल भाषाओं की संख्या तक सीमित नहीं है। अदालत ने मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों को नई व्यवस्था से एक बार की राहत देने पर भी विचार करने को कहा है। वजह यह है कि यही बच्चे आगे चलकर कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा की अनिवार्य परीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे में जिन बच्चों ने अभी तक अपनी भाषा का चुनाव पुरानी व्यवस्था के हिसाब से किया है, उनके सामने अचानक नई भाषा जोड़ने की समस्या पैदा हो सकती है।अदालत ने साफ किया कि तीन भाषा सीखने के विचार से उसे परेशानी नहीं है। चिंता इस बात को लेकर है कि नीति को जमीन पर किस तरह लागू किया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस ज्योयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, एनसीईआरटी और सीबीएसई से नीति के व्यावहारिक पहलुओं पर दोबारा विचार करने को कहा।
अंग्रेजी को लेकर अदालत ने क्यों पूछा सवाल
सुनवाई में एक अहम सवाल अंग्रेजी को लेकर उठा। प्रस्तावित भाषा व्यवस्था में अंग्रेजी को गैर-मातृभाषा की श्रेणी में रखने पर जस्टिस ज्योयमाल्य बागची ने सवाल किया। उन्होंने 'नेटिव' शब्द के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई और कहा कि इस शब्द में औपनिवेशिक सोच की छाप दिखाई देती है।अदालत का सवाल सिर्फ अंग्रेजी के वर्गीकरण तक सीमित नहीं था। मुद्दा यह भी है कि भारत में भाषाओं को देशज और गैर-देशज कहने का आधार क्या होना चाहिए। अंग्रेजी देश की शिक्षा, प्रशासन, न्याय और रोजगार व्यवस्था में लंबे समय से इस्तेमाल होती रही है। ऐसे में उसे किस श्रेणी में रखा जाए, इस पर स्पष्टता जरूरी है।यही कारण है कि भाषा नीति के इस हिस्से पर अदालत की टिप्पणी आने वाले समय में काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
23 भाषाओं का विकल्प, मगर पढ़ाएगा कौन?
तीन भाषा नीति का सबसे व्यावहारिक सवाल शिक्षक को लेकर है। सीबीएसई छात्रों को अलग-अलग भाषाओं में विकल्प देना चाहता है, लेकिन हर स्कूल में हर भाषा का शिक्षक उपलब्ध होना संभव नहीं है।मान लीजिए किसी स्कूल में पढ़ने वाला छात्र तमिल या तेलुगु को तीसरी भाषा के रूप में चुनना चाहता है। अगर उस स्कूल में उस भाषा का शिक्षक ही नहीं है तो छात्र अपनी पसंद कैसे पूरी करेगा? इसी तरह दक्षिण भारत के किसी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा पंजाबी, बंगाली या दूसरी भाषा चुनता है तो उसके लिए भी शिक्षक और अध्ययन सामग्री की जरूरत होगी।सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यावहारिक समस्या को पकड़ते हुए कहा है कि केवल सूची में भाषा का विकल्प देना पर्याप्त नहीं है। छात्र को उस भाषा को पढ़ने का वास्तविक अवसर भी मिलना चाहिए। इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षक, पाठ्यपुस्तकें और दूसरी शैक्षणिक सामग्री जरूरी होगी। अदालत ने सीबीएसई से इन संसाधनों की उपलब्धता को लेकर रोडमैप तैयार करने को कहा है।यही तीन भाषा नीति की सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। नीति पूरे देश के लिए एक जैसी हो सकती है, लेकिन भारत के स्कूलों की स्थिति एक जैसी नहीं है।
कक्षा 6 के छात्रों पर क्यों पड़ा असर
इस मामले का सीधा असर मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों पर पड़ सकता है। अदालत ने सीबीएसई से पूछा है कि क्या इन बच्चों को एक बार की राहत दी जा सकती है।इसका कारण समझना जरूरी है। इस शैक्षणिक सत्र में कक्षा 6 में पढ़ रहे बच्चे जब कक्षा 10 में पहुंचेंगे तो साल 2030-31 में उनकी बोर्ड परीक्षा होगी। नई व्यवस्था के तहत तीसरी भाषा का सवाल उस समय उनके सामने आएगा। अगर उन्होंने अभी तक पुरानी व्यवस्था के अनुसार भाषाओं का चुनाव किया है तो बीच में नई भाषा लागू करने से पढ़ाई का पूरा क्रम बदल सकता है।अदालत का सुझाव है कि जिन बच्चों ने पहले ही अपनी भाषाएं चुन ली हैं, उन्हें संक्रमण काल में राहत दी जाए। नई व्यवस्था को अगले बैच से लागू करने का रास्ता भी देखा जा सकता है। इससे बच्चों को नई भाषा चुनने और उसे सीखने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
फ्रेंच और जर्मन पढ़ने वाले बच्चों की चिंता भी यहीं से जुड़ी है
तीसरी भाषा की नई व्यवस्था का असर उन छात्रों पर भी पड़ सकता है जो अभी फ्रेंच, जर्मन या दूसरी विदेशी भाषा पढ़ रहे हैं। पहले से पढ़ी जा रही भाषा को जारी रखने और नई व्यवस्था में भारतीय भाषाओं को शामिल करने के बीच संतुलन कैसे बनेगा, यह भी बड़ा सवाल है।इसी वजह से अदालत ने मौजूदा छात्रों के लिए एक बार की राहत की संभावना पर विचार करने को कहा है। इससे अचानक भाषा बदलने के दबाव को कम किया जा सकता है।
दिल्ली के स्कूलों में भी सामने आया है बदलाव
तीन भाषा की व्यवस्था को लेकर चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि 2026-27 से कक्षा 9 में तीसरी भाषा को लेकर बदलाव लागू किए जा रहे हैं। दिल्ली के स्कूलों में भी कक्षा 9 के लिए तीसरी भाषा और व्यावसायिक शिक्षा से जुड़े बदलाव सामने आए हैं। इससे यह स्पष्ट है कि भाषा नीति अब सिर्फ कागज पर मौजूद दिशा-निर्देश नहीं है, बल्कि स्कूलों की रोजमर्रा की पढ़ाई का हिस्सा बनने लगी है।लेकिन बदलाव के साथ सवाल भी बढ़े हैं। तीसरी भाषा के लिए कितने पीरियड होंगे? शिक्षक कहां से आएंगे? नई किताबें कब उपलब्ध होंगी? छात्र जिस भाषा को चुनेंगे, क्या हर स्कूल उसे पढ़ा पाएगा? और अगर किसी भाषा के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं है तो बच्चे के पास क्या विकल्प होगा?इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, नई व्यवस्था उतनी ही आसानी से लागू हो सकेगी।
भाषा सीखना बोझ नहीं, अवसर होना चाहिए
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। किसी बच्चे को अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा को लेकर हीनभावना नहीं होनी चाहिए।भारत में भाषा सिर्फ एक विषय नहीं है। यह घर, समाज, संस्कृति और पहचान से जुड़ी होती है। इसलिए स्कूलों में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का उद्देश्य तभी सफल होगा जब बच्चों को यह महसूस हो कि वे अपनी पसंद की भाषा सीख रहे हैं, न कि उन पर एक और विषय थोपा जा रहा है।यही वजह है कि अदालत ने बच्चों पर दबाव नहीं डालने की बात पर जोर दिया है। नई व्यवस्था का मकसद अगर बच्चों को ज्यादा भाषाओं से परिचित कराना है तो उसे सीखने का अवसर बनाना होगा, अतिरिक्त बोझ नहीं।
तीन भाषा नीति का भविष्य अब किस पर निर्भर करेगा
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीबीएसई की तीन भाषा नीति पर रोक नहीं लगाई है। अदालत ने केवल इसके क्रियान्वयन को लेकर सरकार और बोर्ड से दोबारा सोचने को कहा है।अब सीबीएसई और सरकार के सामने कई ठोस सवाल हैं। 23 भाषाओं के लिए कितने प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हैं? कितने स्कूलों में अलग-अलग भाषाओं की पढ़ाई कराई जा सकती है? किताबें और दूसरी अध्ययन सामग्री कितनी मात्रा में उपलब्ध है? जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहां छात्रों को उनकी पसंद की भाषा कैसे उपलब्ध कराई जाएगी? और मौजूदा कक्षा 6 के छात्रों को नई व्यवस्था में किस तरह शामिल किया जाएगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि तीन भाषा नीति वास्तव में कितनी सफल होगी।
भारत में तीन भाषाएं सीखने की सोच नई नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी बहुभाषी शिक्षा पर जोर दिया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इस बहस का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू सामने ला दिया है नीति बनाना एक बात है और उसे लाखों बच्चों की कक्षाओं में सही तरीके से लागू करना दूसरी।अब असली परीक्षा सीबीएसई की है। अगर हर छात्र को अपनी चुनी हुई भाषा पढ़ने के लिए शिक्षक, किताब और पर्याप्त समय मिलता है तो तीन भाषा नीति शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है। लेकिन अगर विकल्प तो बहुत हों और उन्हें पढ़ाने की व्यवस्था सीमित हो, तो यही नीति स्कूलों और छात्रों के लिए नई परेशानी भी पैदा कर सकती है।सुप्रीम कोर्ट की गुरुवार की सुनवाई ने फिलहाल इतना साफ कर दिया है कि भाषाओं की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है यह सुनिश्चित करना कि बच्चा जिस भाषा को चुने, उसे वास्तव में सीख भी सके।
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