मिड-डे मील व्यवस्था में बड़ा बदलाव, ग्राम प्रधान बाहर, अब अभिभावकों के हाथ कमान
उत्तर प्रदेश के लाखों सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से जुड़ी मिड-डे मील योजना में सरकार ने ऐसा बदलाव किया है, जिसकी चर्चा शिक्षा विभाग से लेकर ग्राम पंचायतों तक शुरू हो गई है। वर्षों से जिस व्यवस्था के तहत ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक मिलकर मिड-डे मील योजना का संचालन करते थे, अब वह पूरी तरह बदल गई है। सरकार ने ग्राम प्रधानों की भूमिका समाप्त करते हुए विद्यालय प्रबंध समिति (वीएमसी) के अध्यक्ष और प्रधानाध्यापक को संयुक्त रूप से योजना का संचालन करने की जिम्मेदारी सौंप दी है। इस संबंध में स्कूली शिक्षा महानिदेशालय ने आदेश जारी कर दिया है और प्रदेश के सभी जिलों में नई व्यवस्था लागू कराने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।यह फैसला केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि मिड-डे मील योजना के संचालन की पूरी व्यवस्था को नए ढंग से खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अब विद्यालय के मिड-डे मील खाते का संचालन, भोजन तैयार करने के लिए मिलने वाली कंटीजेंसी राशि का उपयोग, खाद्यान्न से जुड़े भुगतान और रसोइयों के मानदेय का भुगतान वीएमसी अध्यक्ष तथा प्रधानाध्यापक के संयुक्त हस्ताक्षर से होगा। खास बात यह है कि वीएमसी का अध्यक्ष उसी विद्यालय में पढ़ने वाले किसी छात्र का अभिभावक होगा। यानी अब बच्चों के भोजन की निगरानी सीधे उनके अभिभावकों के हाथ में होगी।
उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील योजना का दायरा बेहद बड़ा है। प्रदेश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में हर दिन करोड़ों रुपये खर्च कर लाखों बच्चों को गर्म पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का उद्देश्य केवल बच्चों का पेट भरना नहीं, बल्कि कुपोषण कम करना, स्कूलों में नामांकन और उपस्थिति बढ़ाना तथा गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराना भी है। यही कारण है कि इस योजना के संचालन में होने वाला हर बदलाव सीधे शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करता है।सरकार का तर्क है कि विद्यालय से जुड़े अभिभावकों को योजना का हिस्सा बनाने से पारदर्शिता बढ़ेगी। अभी तक कई जगहों पर भोजन की गुणवत्ता, भुगतान में देरी, सामग्री की खरीद और खर्च के रिकॉर्ड को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। शासन का मानना है कि जब बच्चों के अभिभावक स्वयं योजना के संचालन में शामिल होंगे तो भोजन की गुणवत्ता पर अधिक प्रभावी निगरानी होगी और किसी भी गड़बड़ी की संभावना कम होगी।नई व्यवस्था लागू होने के बाद शिक्षा विभाग ने सभी जिलों को निर्देश दिए हैं कि विद्यालय प्रबंध समितियों का सत्यापन कराया जाए और जहां आवश्यकता हो वहां नए अध्यक्षों का चयन कर बैंक खातों में संयुक्त हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी कराई जाए। बैंक खातों में बदलाव, आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन और वित्तीय अधिकारों का हस्तांतरण तेजी से कराया जा रहा है ताकि किसी भी विद्यालय में मिड-डे मील वितरण प्रभावित न हो।
हालांकि सरकार के इस फैसले के बाद प्रदेश के कई हिस्सों में ग्राम प्रधान संगठनों ने विरोध भी शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि पंचायतों को योजना से पूरी तरह अलग करना उचित नहीं है। ग्राम प्रधानों का तर्क है कि गांव के विकास कार्यों के साथ-साथ विद्यालयों की निगरानी भी पंचायतों की जिम्मेदारी रही है। ऐसे में उनकी भूमिका समाप्त होने से स्थानीय स्तर पर समन्वय कमजोर पड़ सकता है। कई प्रधान संगठनों का कहना है कि यदि किसी प्रकार की समस्या आती है तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।दूसरी ओर शिक्षा विभाग का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य किसी संस्था की भूमिका कम करना नहीं, बल्कि योजना को अधिक जवाबदेह बनाना है। विभाग का मानना है कि विद्यालय प्रबंध समिति पहले से ही स्कूल के विकास और निगरानी से जुड़ी संस्था है। यदि उसी समिति के अध्यक्ष को वित्तीय जिम्मेदारी भी दी जाती है तो निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी और विद्यालय स्तर पर जवाबदेही भी बढ़ेगी।इस बदलाव का असर विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों पर भी साफ दिखाई देगा। अब उन्हें केवल पढ़ाई और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि वित्तीय प्रबंधन में भी अधिक सक्रिय भूमिका निभानी पड़ेगी। वीएमसी अध्यक्ष के साथ समन्वय, बैंकिंग प्रक्रिया, भुगतान, अभिलेखों का रखरखाव और शासन के दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल होगा।
रसोइयों के लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से मानदेय के भुगतान में देरी की शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि नई व्यवस्था के तहत भुगतान प्रक्रिया सरल और समयबद्ध होती है तो इसका सीधा लाभ रसोइयों को मिल सकता है। हालांकि शुरुआती दौर में बैंक खाते बदलने और दस्तावेजी औपचारिकताओं के कारण कुछ तकनीकी दिक्कतें आने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि विद्यालय प्रबंध समितियों को पहले भी स्कूलों की निगरानी और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी, लेकिन अब वित्तीय अधिकार मिलने के बाद उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाएगी। ऐसे में जरूरी होगा कि वीएमसी अध्यक्षों को बैंकिंग, लेखा-जोखा और सरकारी प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण भी दिया जाए, ताकि योजना का संचालन बिना किसी बाधा के हो सके।पिछले कुछ वर्षों में मिड-डे मील योजना को लेकर सरकार लगातार सुधार की दिशा में कदम उठाती रही है। भोजन की गुणवत्ता की ऑनलाइन निगरानी, डिजिटल उपस्थिति, खाद्यान्न वितरण की पारदर्शी व्यवस्था और समय-समय पर निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं पहले ही लागू की जा चुकी हैं। अब वीएमसी अध्यक्षों को योजना के केंद्र में लाकर सरकार स्थानीय स्तर पर सामाजिक निगरानी को और मजबूत करना चाहती है।
फिलहाल शिक्षा विभाग का पूरा ध्यान इस बात पर है कि नई व्यवस्था के कारण किसी भी विद्यालय में बच्चों के भोजन पर असर न पड़े। सभी जिलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बैंक खातों में बदलाव और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं समय पर पूरी कराई जाएं तथा भोजन वितरण पहले की तरह नियमित चलता रहे।आने वाले समय में यह बदलाव कितना सफल साबित होगा, इसका आकलन इसके क्रियान्वयन से होगा। यदि अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी से पारदर्शिता बढ़ती है, भुगतान समय पर होता है और बच्चों को बेहतर गुणवत्ता का भोजन मिलता है, तो यह फैसला मिड-डे मील योजना के लिए बड़ा सुधार माना जाएगा। वहीं यदि समन्वय और प्रशिक्षण की कमी रही तो नई व्यवस्था भी पुरानी चुनौतियों का सामना कर सकती है। इतना तय है कि उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील योजना अब एक नए प्रशासनिक मॉडल के साथ आगे बढ़ने जा रही है, जिसका सबसे बड़ा उद्देश्य बच्चों तक समय पर गुणवत्तापूर्ण और पौष्टिक भोजन पहुंचाना है।

0 Comments:
एक टिप्पणी भेजें