परिषद‍ीय विद्यालयों की अवकाश तालिका वर्ष 2026 देखें व करें डाउनलोड

👇Primary Ka Master Latest Updates👇

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

Opinion: बच्चों के नतीजे खराब हों तो शिक्षक जिम्मेदार, लेकिन शिक्षक की कमी के लिए कौन जिम्मेदार?

Opinion: बच्चों के नतीजे खराब हों तो शिक्षक जिम्मेदार, लेकिन शिक्षक की कमी के लिए कौन जिम्मेदार?


 Opinion: बच्चों के नतीजे खराब हों तो शिक्षक जिम्मेदार, लेकिन शिक्षक की कमी के लिए कौन जिम्मेदार?

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में जब किसी बच्चे के परीक्षा परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आते तो सबसे पहले सवाल शिक्षक की कार्यशैली पर उठता है। पढ़ाई ठीक से क्यों नहीं हुई, बच्चों का प्रदर्शन कमजोर क्यों रहा, शिक्षक ने अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई इन सवालों से शिक्षक का सामना होना भी चाहिए। आखिर कक्षा में बच्चों को पढ़ाने और उनकी समझ को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी शिक्षक की ही है। लेकिन राजस्थान की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक ऐसा सवाल भी खड़ा कर रही है, जिसका जवाब केवल शिक्षक से नहीं मांगा जा सकता। अगर किसी स्कूल में शिक्षक का पद ही खाली है, अगर किसी विषय को पढ़ाने वाला शिक्षक मौजूद नहीं है, अगर एक शिक्षक को जरूरत से ज्यादा कक्षाएं संभालनी पड़ रही हैं, तो उन परिस्थितियों में बच्चों के कमजोर परिणाम की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी अब कोई छोटी या स्थानीय समस्या नहीं रह गई है। सामने आए आंकड़ों के अनुसार राज्य में 76,791 रिक्त पदों को गेस्ट फैकल्टी के माध्यम से भरने की जरूरत बताई गई है। शाला दर्पण के आंकड़ों में भी बड़ी संख्या में शैक्षणिक पद खाली बताए गए हैं। इनमें वरिष्ठ अध्यापक और व्याख्याता के हजारों पद शामिल हैं। यह आंकड़ा केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज खाली कुर्सियों की संख्या नहीं है। हर खाली पद के पीछे एक ऐसी कक्षा है, जहां बच्चों को नियमित शिक्षक मिलने में परेशानी हो सकती है। हर खाली पद के पीछे एक ऐसा विषय है, जिसे बच्चे शायद उतनी गंभीरता से नहीं पढ़ पा रहे हों, जितनी उनसे परीक्षा में उम्मीद की जाती है।

यही वह जगह है जहां शिक्षक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी के बीच अंतर समझना जरूरी हो जाता है। शिक्षक से यह उम्मीद करना बिल्कुल सही है कि वह समय पर स्कूल पहुंचे, पूरी तैयारी के साथ कक्षा ले, बच्चों की कमजोरियों को समझे और परिणाम सुधारने की कोशिश करे। लेकिन अगर किसी स्कूल में विज्ञान का शिक्षक नहीं है, गणित का पद महीनों से खाली है या वरिष्ठ कक्षाओं के लिए विषय विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है, तो केवल मौजूद शिक्षक को परिणाम के लिए जिम्मेदार ठहराना समस्या का अधूरा आकलन होगा। शिक्षक से उस कमी का जवाब कैसे मांगा जा सकता है, जो उसके निर्णय से पैदा ही नहीं हुई?राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की हालिया स्थिति इस समस्या को और गंभीर बना देती है। बाड़मेर जिले के बालोतरा क्षेत्र में विद्यार्थियों के विरोध के बीच जिस स्कूल की स्थिति सामने आई, वहां कक्षा 12 तक की पढ़ाई के लिए केवल एक शिक्षक होने की बात सामने आई। एक शिक्षक के सामने प्राथमिक कक्षाओं से लेकर वरिष्ठ कक्षाओं तक की जिम्मेदारी हो तो उससे हर कक्षा का पाठ्यक्रम समय पर पूरा करने और हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देने की उम्मीद कितनी व्यावहारिक है? ऐसे स्कूल में अगर किसी कक्षा के बच्चे परीक्षा में पीछे रह जाते हैं तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि शिक्षक ने क्या किया। सवाल यह भी होना चाहिए कि शिक्षा विभाग ने उस स्कूल को पर्याप्त शिक्षक क्यों नहीं दिए।

यहां एक और बात समझने की जरूरत है। बच्चों के परिणाम केवल परीक्षा से कुछ दिन पहले की मेहनत का परिणाम नहीं होते। किसी बच्चे की नींव एक पूरे साल में तैयार होती है। शिक्षक नियमित रूप से पढ़ाता है, बच्चे के सवालों का जवाब देता है, उसकी गलतियां सुधारता है और धीरे-धीरे उसे कठिन विषयों के लिए तैयार करता है। यदि इस प्रक्रिया में महीनों तक शिक्षक की कमी बनी रहे तो उसका असर परीक्षा के दिन अचानक नहीं दिखता, बल्कि पूरे शैक्षणिक सत्र में जमा होता रहता है। इसलिए परिणाम खराब होने के बाद केवल अंतिम कड़ी यानी शिक्षक को पकड़ लेना आसान जरूर है, लेकिन इससे मूल समस्या खत्म नहीं होती।राजस्थान में 76,791 रिक्त पदों को भरने के लिए गेस्ट फैकल्टी की व्यवस्था इसी समस्या से तत्काल राहत देने की कोशिश है। जिस स्कूल में शिक्षक नहीं है, वहां किसी योग्य व्यक्ति की नियुक्ति निश्चित रूप से बच्चों के हित में है। पढ़ाई रुकने से बेहतर है कि कम से कम अस्थायी तौर पर शिक्षक उपलब्ध कराया जाए। लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि गेस्ट फैकल्टी स्थायी शिक्षक व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकती। अस्थायी व्यवस्था संकट को कुछ समय के लिए संभाल सकती है, लेकिन अगर हर साल खाली पदों को इसी तरीके से भरा जाता रहा तो सवाल भर्ती व्यवस्था पर ही उठेगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में पद खाली होने की स्थिति पहले से क्यों नहीं पहचानी गई। शिक्षक सेवानिवृत्त होते हैं, नए पद बनते हैं, विद्यार्थियों की संख्या बदलती है और विषयवार जरूरत बदलती है। यह सब अचानक नहीं होता। शिक्षा विभाग के पास हर स्कूल, हर कक्षा और हर विषय से जुड़े आंकड़े मौजूद होते हैं। फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अगले शैक्षणिक सत्र से पहले ही यह तय कर लिया जाए कि किस स्कूल में कितने शिक्षक चाहिए और किस विषय के कितने पद खाली होने वाले हैं?अगर यह व्यवस्था मजबूत हो जाए तो शिक्षक भर्ती केवल तब शुरू नहीं होगी जब स्कूलों में समस्या दिखाई देने लगे। भर्ती की योजना पहले से बनेगी और शिक्षक भी समय पर स्कूल पहुंचेंगे। इससे शिक्षक भर्ती परीक्षा देने वाले युवाओं को भी स्पष्टता मिलेगी और सरकारी स्कूलों को भी समय पर मानव संसाधन मिलेगा।इस बहस का दूसरा पहलू शिक्षक की जवाबदेही है। शिक्षकों को केवल इसलिए जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि स्कूलों में रिक्तियां हैं। यदि पर्याप्त शिक्षक होने के बावजूद कोई शिक्षक कक्षा नहीं लेता, बच्चों पर ध्यान नहीं देता या अपने दायित्व से बचता है तो उस पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। शिक्षक को समाज ने एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है और उस जिम्मेदारी से भागने की छूट किसी को नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन जवाबदेही का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि व्यवस्था की हर कमी का बोझ एक शिक्षक के सिर डाल दिया जाए।

अगर स्कूल में पांच विषयों के लिए केवल दो शिक्षक हैं तो यह शिक्षक की गलती नहीं है। अगर एक शिक्षक को एक साथ कई कक्षाएं संभालनी पड़ रही हैं तो यह उसकी पसंद नहीं है। अगर शिक्षक को पढ़ाने के अलावा लगातार ऐसे प्रशासनिक कामों में लगाया जाता है जिनका सीधा संबंध कक्षा शिक्षण से नहीं है, तो उसके पढ़ाने के समय का कम होना भी केवल शिक्षक की कार्यक्षमता का सवाल नहीं रह जाता। इसलिए शिक्षक की जवाबदेही तय करते समय उसके काम की परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए।आज शिक्षा व्यवस्था को एक ऐसे संतुलन की जरूरत है जिसमें शिक्षक से ईमानदारी और मेहनत की पूरी उम्मीद हो, लेकिन सरकार और विभाग से भी उतनी ही स्पष्ट जवाबदेही मांगी जाए। जिस तरह शिक्षक से पूछा जाता है कि बच्चों का परिणाम क्यों खराब हुआ, उसी तरह विभाग से भी पूछा जाना चाहिए कि उस स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं था। जिस तरह शिक्षक से पाठ्यक्रम पूरा करने का हिसाब लिया जाता है, उसी तरह यह भी देखा जाना चाहिए कि उसके पास पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन थे या नहीं।राजस्थान के कई जिलों में छात्रों द्वारा स्कूलों में शिक्षक और सुविधाओं की मांग को लेकर आवाज उठाना इस बात का संकेत है कि यह समस्या अब केवल शिक्षकों और शिक्षा विभाग के बीच का मामला नहीं रही। विद्यार्थी खुद महसूस कर रहे हैं कि उनके स्कूल में कुछ कमी है। जब बच्चे शिक्षक की मांग को लेकर विरोध करने लगें तो उसे अनुशासनहीनता कहकर खत्म करना आसान रास्ता है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं। बच्चों की बात सुननी होगी, क्योंकि वे उसी व्यवस्था के सबसे सीधे लाभार्थी हैं जिसके बारे में सरकार नीतियां बनाती है।सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अब केवल भर्ती की संख्या बताना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि स्कूलवार शिक्षक उपलब्धता की स्थिति स्पष्ट हो, विषयवार रिक्तियां सामने हों और लंबे समय से खाली पदों को भरने की समयसीमा तय हो। यदि किसी स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या अधिक है तो उसी अनुपात में शिक्षक उपलब्ध होने चाहिए। यदि किसी विषय में लगातार कमी है तो भर्ती की प्राथमिकता भी उसी आधार पर तय होनी चाहिए।सबसे जरूरी बात यह है कि शिक्षा के परिणाम को केवल अंक और प्रतिशत के रूप में देखना बंद करना होगा। अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके पीछे की व्यवस्था उससे भी महत्वपूर्ण है।  

जिस बच्चे को पूरे साल अच्छा शिक्षक मिला, उसे सीखने का अवसर मिला और उसे नियमित मार्गदर्शन मिला, उसके परिणाम की तुलना उस बच्चे से करना उचित नहीं होगा जिसे पूरे साल शिक्षक की कमी का सामना करना पड़ा।इसलिए राजस्थान में अब सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि बच्चों के नतीजे खराब क्यों आए। सवाल यह भी होना चाहिए कि बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल में पर्याप्त शिक्षक थे या नहीं। शिक्षक से जवाब मांगना जरूरी है, लेकिन शिक्षक की कमी का जवाब भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति की नहीं होती जो कक्षा में खड़ा दिखाई देता है। उसके पीछे भर्ती व्यवस्था, पदस्थापन, प्रशासन, संसाधन और सरकारी नीति की पूरी श्रृंखला होती है।अगर सरकार वास्तव में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना चाहती है तो उसे शिक्षक को केवल परिणाम देने वाली मशीन की तरह नहीं देखना चाहिए। शिक्षक को पर्याप्त संख्या में सहकर्मी, विषय विशेषज्ञ, पढ़ाने का समय और जरूरी संसाधन देने होंगे। इसके बाद शिक्षक से परिणाम मांगना पूरी तरह उचित होगा। लेकिन जब कक्षा में शिक्षक ही नहीं है, तब कमजोर परिणाम के लिए केवल शिक्षक को दोष देना उस बच्चे के साथ भी अन्याय है जिसने पूरे साल एक पूरी व्यवस्था की कमी झेली है।आखिरकार सबसे बड़ा सवाल यही है बच्चों के नतीजे खराब हों तो शिक्षक जिम्मेदार, लेकिन शिक्षक की कमी के लिए कौन जिम्मेदार? इस सवाल का ईमानदार जवाब ही राजस्थान की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में असली सुधार की शुरुआत कर सकता है।

Opinion: बच्चों के नतीजे खराब हों तो शिक्षक जिम्मेदार, लेकिन शिक्षक की कमी के लिए कौन जिम्मेदार? Rating: 4.5 Diposkan Oleh: UP BASIC NEWS

0 Comments:

एक टिप्पणी भेजें