कानून सख्त, कोचिंग जारी क्यों? शिक्षक जवाबदेही पर बड़ा सवाल
सरकारी स्कूल की छुट्टी होते ही शहरों और कस्बों में हजारों निजी कोचिंग सेंटरों की क्लास शुरू हो जाती है। इन कोचिंग संस्थानों को लेकर अक्सर एक सवाल उठता है कि क्या सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक भी यहां पढ़ा सकता है? यह बहस नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में अलग-अलग राज्यों से सामने आई शिकायतों ने इसे फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सरकारी शिक्षक प्राइवेट कोचिंग से जुड़ा यह मामला केवल सेवा नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता, गरीब बच्चों के भविष्य और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से भी सीधे जुड़ा हुआ है।शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की धारा 28 स्पष्ट रूप से कहती है कि इस अधिनियम के दायरे में आने वाला कोई भी शिक्षक निजी ट्यूशन या निजी शिक्षण गतिविधि में शामिल नहीं होगा। कानून का उद्देश्य भी बिल्कुल साफ है। सरकार चाहती थी कि शिक्षक अपनी पूरी क्षमता और समय विद्यालय में लगाएं ताकि बच्चों को अतिरिक्त कोचिंग की जरूरत ही न पड़े। लेकिन सवाल यह है कि जब कानून इतना स्पष्ट है, तब भी सरकारी शिक्षक निजी ट्यूशन को लेकर विवाद खत्म क्यों नहीं हो रहे?
असल में भारत की शिक्षा व्यवस्था पिछले दो दशकों में तेजी से बदली है। प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या, बोर्ड परीक्षाओं में अधिक अंक लाने की होड़ और अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाओं ने निजी कोचिंग उद्योग को अरबों रुपये के कारोबार में बदल दिया है। देश के लगभग हर शहर में छोटे-बड़े कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। ऐसे माहौल में समय-समय पर यह आरोप भी सामने आते हैं कि कुछ सरकारी शिक्षक स्कूल के बाद निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ा रहे हैं या स्वयं ट्यूशन चला रहे हैं।यहीं से सबसे बड़ा कानूनी सवाल पैदा होता है। क्या कोई सरकारी शिक्षक स्कूल खत्म होने के बाद फीस लेकर किसी निजी कोचिंग संस्थान में पढ़ा सकता है? इसका उत्तर केवल "हां" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। यह शिक्षक की नियुक्ति, उसके सेवा नियमों और संबंधित कानून पर निर्भर करता है। यदि शिक्षक RTE अधिनियम और राज्य के सेवा नियमों के दायरे में आता है तथा निजी शिक्षण गतिविधि पर प्रतिबंध है, तो ऐसा करना नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे हैं। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थी ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके लिए निजी कोचिंग की फीस देना आसान नहीं होता। यदि विद्यालय की पढ़ाई कमजोर हो और बच्चों को मजबूरी में बाहर कोचिंग लेनी पड़े, तो शिक्षा में समान अवसर की अवधारणा कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि RTE धारा 28 को केवल सेवा नियम नहीं बल्कि सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।हालांकि हर सरकारी शिक्षक पर संदेह करना उचित नहीं होगा। देशभर में बड़ी संख्या में शिक्षक पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वे विद्यालय में अतिरिक्त समय देकर कमजोर विद्यार्थियों की मदद करते हैं और बेहतर परिणाम देने के लिए लगातार प्रयास करते हैं। इसलिए किसी वायरल वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट या अफवाह के आधार पर किसी शिक्षक को दोषी मान लेना न केवल गलत है बल्कि कानूनी रूप से भी उचित नहीं माना जाता।
यदि किसी शिक्षक के खिलाफ सरकारी शिक्षक प्राइवेट कोचिंग चलाने की शिकायत मिलती है तो संबंधित शिक्षा विभाग सबसे पहले उसकी जांच करता है। शिकायत के साथ उपलब्ध साक्ष्य देखे जाते हैं, शिक्षक से स्पष्टीकरण मांगा जाता है और आवश्यक होने पर विभागीय जांच बैठाई जाती है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित राज्य के सेवा नियमों के अनुसार चेतावनी, वेतन वृद्धि रोकने, निलंबन या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं है कि हर शिकायत का परिणाम सीधे नौकरी समाप्त होना ही होगा।बीते कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात सहित कई राज्यों में शिक्षा विभागों ने निजी ट्यूशन को लेकर समय-समय पर निर्देश जारी किए हैं। कई स्थानों पर जांच भी हुई और कुछ मामलों में कार्रवाई की खबरें भी सामने आईं। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन इस विषय को गंभीरता से देख रहा है, लेकिन पूरे देश में एक समान और प्रभावी निगरानी व्यवस्था अभी भी चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाकर समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि सरकार वास्तव में निजी कोचिंग पर निर्भरता कम करना चाहती है तो सरकारी विद्यालयों की पढ़ाई को मजबूत बनाना होगा। पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, आधुनिक शिक्षण सामग्री, नियमित प्रशिक्षण, बच्चों के सीखने के स्तर का आकलन और कमजोर विद्यार्थियों के लिए स्कूल में ही अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था विकसित करनी होगी। जब तक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर अभिभावकों का भरोसा नहीं बढ़ेगा, तब तक निजी कोचिंग का बाजार कमजोर पड़ना मुश्किल है।यह भी समझना जरूरी है कि सभी कोचिंग संस्थान केवल स्कूल की कमजोर पढ़ाई की वजह से नहीं चलते। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC, NEET, JEE, CUET, बैंकिंग और अन्य भर्ती परीक्षाओं की तैयारी के लिए अलग प्रकार की कोचिंग की आवश्यकता होती है। इसलिए सामान्य अकादमिक सहायता और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। विवाद मुख्य रूप से तब पैदा होता है जब सरकारी शिक्षक अपने सेवा नियमों के विपरीत निजी शिक्षण गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं।
अभिभावकों की भूमिका भी इस पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण है। यदि किसी के पास किसी सरकारी शिक्षक द्वारा नियमों के विरुद्ध निजी कोचिंग चलाने के ठोस प्रमाण हों तो संबंधित प्रधानाध्यापक, खंड शिक्षा अधिकारी, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी या अन्य सक्षम अधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत की जा सकती है। शिकायत में तारीख, स्थान, कोचिंग संस्थान का नाम और उपलब्ध साक्ष्य शामिल करने से जांच प्रक्रिया आसान होती है। वहीं बिना सत्यापन किसी शिक्षक का नाम या फोटो सोशल मीडिया पर साझा करना उचित नहीं है क्योंकि इससे किसी निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है।सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है जो वर्षों पहले था क्या केवल कानून बना देने से शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है। कानून आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक जरूरी उसका निष्पक्ष पालन, प्रभावी निगरानी और सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है। जब विद्यालय की पढ़ाई मजबूत होगी, शिक्षक पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना दायित्व निभाएंगे और विभाग शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करेगा, तभी RTE Act 2009 और RTE धारा 28 का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा केवल एक विद्यार्थी नहीं, बल्कि देश के भविष्य का हिस्सा है। उसकी आर्थिक स्थिति कभी भी उसकी शिक्षा की गुणवत्ता तय नहीं करनी चाहिए। इसलिए जरूरत केवल सरकारी शिक्षक प्राइवेट कोचिंग पर बहस करने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने की है जहां हर बच्चे को विद्यालय के भीतर ही इतनी अच्छी पढ़ाई मिले कि उसे मजबूरी में बाहर कोचिंग का सहारा न लेना पड़े। कानून की असली ताकत उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन में होती है।

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