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शनिवार, 22 अगस्त 2026

OPINION: शिक्षक को दोष देना आसान है, लेकिन क्या हमने उसे पढ़ाने लायक व्यवस्था दी है?

 

OPINION: शिक्षक को दोष देना आसान है, लेकिन क्या हमने उसे पढ़ाने लायक व्यवस्था दी है?

OPINION: शिक्षक को दोष देना आसान है, लेकिन क्या हमने उसे पढ़ाने लायक व्यवस्था दी है?

पांच सितंबर को देश के 48 स्कूली शिक्षक राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाएंगे। यह समारोह हर साल होता है, तालियां बजती हैं, शिक्षक सम्मानित होते हैं और मंच से उन्हें राष्ट्र निर्माता कहा जाता है। लेकिन इस बार इस सम्मान के साथ एक असहज सवाल भी खड़ा होना चाहिए: जिस शिक्षक को देश बच्चों का भविष्य गढ़ने वाला मानता है, उसे क्या सचमुच पढ़ाने का पर्याप्त समय, जरूरी संसाधन और पेशेवर स्वतंत्रता मिल रही है?यह सवाल भावनात्मक नहीं, आंकड़ों से निकलता है। यूडीआईएसई प्लस 2025-26 के अनुसार देश में शिक्षकों की संख्या बढ़कर 1,02,73,020 हो गई है। 2022-23 में यही संख्या 94,83,294 थी। यानी तीन साल में 7.89 लाख से ज्यादा शिक्षक जुड़े। छात्र-शिक्षक अनुपात भी कई स्तरों पर बेहतर हुआ है। फिर भी 2025-26 में 1,00,843 स्कूल ऐसे रहे जहां केवल एक शिक्षक था। यही वह अंतर है जिसे राष्ट्रीय औसत छिपा देता है।एक करोड़ से अधिक शिक्षक होना उपलब्धि है, लेकिन हर कक्षा में जरूरी शिक्षक होना उससे बड़ी उपलब्धि होगी। पहाड़, आदिवासी क्षेत्र, सीमावर्ती इलाकों और दूरदराज के गांवों के स्कूलों में विषयवार शिक्षक की कमी आज भी बच्चों के अवसर तय करती है। कहीं गणित का शिक्षक नहीं, कहीं विज्ञान का पद खाली, कहीं प्रधानाध्यापक नहीं। ऐसे स्कूल में स्मार्ट बोर्ड लगा देने से शिक्षा आधुनिक नहीं हो जाती। बच्चे को पढ़ाने वाला शिक्षक ही स्कूल की असली बुनियाद है।

उत्तर प्रदेश का उदाहरण इस राष्ट्रीय बहस को और तीखा करता है। जुलाई में सामने आए सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के 81 हजार से अधिक स्वीकृत शिक्षक पद खाली थे। प्राथमिक स्तर पर 2,50,488 स्वीकृत पदों में 77,400 रिक्तियां थीं, जबकि माध्यमिक स्तर पर 11,083 पदों में 4,421 खाली थे। यानी समस्या केवल शिक्षक भर्ती की गति नहीं, पदों और जरूरत के बीच लंबे समय से बने अंतर की भी है।लेकिन शिक्षक संकट का दूसरा चेहरा रिक्त पद नहीं, शिक्षक का समय है। जिस शिक्षक से कक्षा पढ़ाने के साथ मतदाता सूची, चुनाव, सर्वे, प्रशासनिक रिपोर्ट या दूसरे गैर-शैक्षणिक काम कराए जाते हैं, उससे सीखने के परिणामों की पूरी जिम्मेदारी मांगना न्यायपूर्ण नहीं। अप्रैल में उत्तर प्रदेश के शिक्षकों ने गैर-शैक्षणिक कामों को पढ़ाई में बाधा बताया था। जुलाई में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी चुनावी काम देते समय शिक्षकों के तनाव और कार्यभार को ध्यान में रखने की जरूरत कही। अलग-अलग राज्यों से आती ये आवाजें बताती हैं कि समस्या स्थानीय नहीं है।यहां शिक्षक की जवाबदेही पर भी उतनी ही साफ बात होनी चाहिए। शिक्षक को पेशेवर स्वतंत्रता देने का अर्थ यह नहीं कि उपस्थिति, तैयारी, मूल्यांकन और विद्यार्थियों की प्रगति पर सवाल न हों। खराब प्रदर्शन पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन जवाबदेही तभी विश्वसनीय होगी जब सरकार भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे। खाली पद, खराब भवन, अनुपलब्ध सामग्री, प्रशिक्षण की कमी और अत्यधिक गैर-शैक्षणिक काम के बीच शिक्षक को अकेला दोषी बनाना आसान रास्ता है, समाधान नहीं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षक को शिक्षा सुधार के केंद्र में रखा है। नीति के तहत प्रत्येक शिक्षक और स्कूल प्रमुख के लिए हर वर्ष कम से कम 50 घंटे सतत व्यावसायिक विकास का लक्ष्य रखा गया। विचार सही है, लेकिन प्रशिक्षण की सफलता घंटे गिनने से नहीं होगी। सवाल है कि प्रशिक्षण के बाद कक्षा में क्या बदला? क्या शिक्षक कमजोर पाठक को पहचान पा रहा है? क्या वह बच्चों की अलग सीखने की गति के अनुसार तरीका बदल पा रहा है? प्रशिक्षण को प्रमाणपत्र से निकालकर कक्षा के परिणाम तक पहुंचाना होगा।राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की इस साल की सूची भी इसी दिशा में संकेत देती है। 48 चयनित शिक्षकों में उत्तर प्रदेश के तीन और बिहार के दो शिक्षक शामिल हैं। बिहार की खुशबू कुमारी को बच्चों को मनोरंजन के साथ पढ़ाने के तरीके के लिए पहचान मिली। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि अच्छा शिक्षक केवल पाठ पूरा नहीं करता, वह बच्चे को सीखने के लिए तैयार करता है। लेकिन यहां भी एक खतरा है। व्यवस्था को असाधारण शिक्षक की कहानी सुनाकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए; उसे यह पूछना चाहिए कि उस शिक्षक की अच्छी पद्धति दूसरे स्कूलों तक कैसे पहुंचेगी।एक और बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। 2025-26 में महिला शिक्षक कुल शिक्षकों का 54.9 प्रतिशत हैं। यह केवल संख्या नहीं है। इसका अर्थ है कि शिक्षक कार्यबल की संरचना बदल रही है और स्कूलों को सुरक्षित, सम्मानजनक तथा समान अवसर वाला कार्यस्थल बनाने की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है। शिक्षक नीति को भर्ती की गिनती से आगे बढ़कर पूरे पेशेवर जीवन को देखना होगा।

अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा में नई चुनौती लेकर आ रही है। एआई पाठ योजना, अभ्यास सामग्री और मूल्यांकन में मदद कर सकता है, लेकिन शिक्षक की जगह नहीं ले सकता। बच्चे की झिझक, पारिवारिक परिस्थिति, डर और जिज्ञासा को समझना केवल तकनीक का काम नहीं है। इसलिए भविष्य की शिक्षक नीति का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एआई शिक्षक को हटाएगा या नहीं। सवाल होना चाहिए कि एआई शिक्षक को कागजी और दोहराए जाने वाले काम से कितना मुक्त कर सकता है।भारत में शिक्षा पर बहस अक्सर दो छोरों पर चली जाती है। एक तरफ शिक्षक से चमत्कार की उम्मीद की जाती है, दूसरी तरफ हर समस्या का दोष शिक्षक पर डाल दिया जाता है। दोनों दृष्टियां अधूरी हैं। शिक्षक न तो व्यवस्था की हर कमी का जिम्मेदार है और न जवाबदेही से ऊपर। उसे अधिकार और जिम्मेदारी दोनों चाहिए।शिक्षक दिवस का सबसे सच्चा सम्मान पुरस्कार नहीं, व्यवस्था का व्यवहार होगा। यदि सरकार चाहती है कि शिक्षक बच्चों में आलोचनात्मक सोच, कौशल और जिज्ञासा पैदा करे तो उसे शिक्षक को पढ़ाने का समय देना होगा। यदि अच्छे परिणाम चाहिए तो विषयवार रिक्तियां भरनी होंगी। यदि नई शिक्षा नीति लागू करनी है तो प्रशिक्षण को वास्तविक कक्षा से जोड़ना होगा। यदि डिजिटल और एआई शिक्षा चाहिए तो शिक्षक को उसका सक्षम उपयोगकर्ता बनाना होगा। आखिरकार शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर पुरस्कार मंच पर नहीं, उस सामान्य सरकारी स्कूल की कक्षा में दिखती है जहां बच्चे शिक्षक का इंतजार कर रहे होते हैं। देश को ऐसे स्कूल चाहिए जहां अच्छा शिक्षक अपवाद नहीं, सामान्य व्यवस्था हो। पांच सितंबर को 48 शिक्षकों को सम्मान मिलेगा; यह सम्मान जरूरी है। लेकिन उसके अगले दिन देश को उन करोड़ों शिक्षकों के बारे में सोचना होगा जो बिना मंच, बिना पदक और बिना सुर्खियों के रोज बच्चों के भविष्य पर काम कर रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि व्यवस्था उन्हें पढ़ाने दे।यही शिक्षा सुधार की असली परीक्षा।

OPINION: शिक्षक को दोष देना आसान है, लेकिन क्या हमने उसे पढ़ाने लायक व्यवस्था दी है? Rating: 4.5 Diposkan Oleh: UP BASIC NEWS

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