सात तालों में बंद तबादला नीति
तबादलों में पैसे चलने को लेकर सालभर पहले शिक्षकों से भरी सभा में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का हैरत भरा सवाल करना सबको याद है। देर से ही सही, सीएम ने इस बात को स्वीकार कर ही लिया है कि सरकारी महकमों में तबादलों के लिए दलाल सक्रिय हैं। तभी तो शिक्षक संघों की ओर से आयोजित सत्कार कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को यह कहना पड़ा कि शिक्षक, दलाल के पास गए तो तबादला निरस्त कर दूंगा। ऐसा कहना नई बात नहीं। हो सकता है कि सीएम तबादला निरस्त करने के ऐसे एकाध उदाहरण पेश भी कर दें। लेकिन वे खुद इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकारी कार्मिकों के लिए तबादला नीति बनाए बगैर दलालों को बाहर करना आसान काम नहीं। कोई नीति बन गई तो भला फिर विधायक और दूसरे जनप्रतिनिधियों को कौन पूछेगा? तभी तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा तक इसी कार्यक्रम में शिक्षा मंत्री बीडी कल्ला को इंगित करते हुए कहते हैं कि तबादले नहीं खोले तो शिक्षक हमारे ही कपड़े फाड़ेंगे।
पिछले सालों में सत्ता में चाहे कांग्रेस रही हो या भारतीय जनता पार्टी। तबादलों को लेकर दलालों के सक्रिय होने की खबरें गाहे-बगाहे सामने आती ही रहीं है। दलाल भी उन्हीं के पाले-पोसे होते हैं जिनकी डिजायर को सरकारें तबादलों की अनिवार्यता बना देती है। शिक्षक हो या फिर डॉक्टर या कोई इंजीनियर, मनमाफिक जगह तबादले के लिए कोई न कोई ‘सूत्र’ तलाशने में ही जुटे रहते हैं। सरकारें भी तबादले खोलने व इन पर रोक लगाने का काम जब करती है तो इन सूत्रों के लिए उत्सव बनकर आता है। सीएम भले ही यह कहते हैं कि तबादलों के लिए जयपुर में भीड़ न करें, पर हकीकत यह है कि तबादलों के दौर में सर्वाधिक भीड़ भी मंत्रियों के बंगलों पर ही नजर आती है।
तृतीय श्रेणी शिक्षकों को सिर्फ अध्यापक के नाम से संबोधित कर उनके प्रति सम्मान जताने का दावा कर रही सरकार की तबादला नीति न जाने कौनसे सात तालों में बंद पड़ी है। पिछली बार भी ऑनलाइन तबादला आवेदन मांगने का दिखावा तो खूब हुआ लेकिन ऐन मौके पर कह दिया कि भविष्य में तबादले एक तय नीति बनाकर ही होंगे। तबादला नीति का शोर भी खूब मचता है। सरकार की ओर से गठित कमेटी की रिपोर्ट भी ‘डिजायर’ की आंधी में न जाने कहां उड़ गई। पिछली भाजपा सरकार ने भी तबादला नीति बनाने के लिए मंत्रियों की समिति बनाई थी। इसकी सिफारिशें भी फाइलों में ही दब कर रह गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तृतीय श्रेणी शिक्षकों के लिए तबादलों के इंतजार की यह इंतहा क्यों हो रही है? तबादलों में ही उलझे रहने वाले शिक्षकों से आखिर बेहतर पढ़ाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इन सवालों के बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच चुनाव नजदीक आते देख कर ही सरकार तबादला रूपी इस बर्र के छत्ते में हाथ डालने से घबरा रही है? बर्र का छत्ता इसलिए कि चुनावी साल में सरकार अपने कार्मिकों, खास तौर से शिक्षकों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी।
भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टोलरेंस की बातें करने वाली सरकार यदि सचमुच तबादलों में ‘दलाल संस्कृति’ को खत्म करना चाहती है तो तबादलों को राजनीति से दूर रखना होगा? तबादलों के नियम-कायदे बन जाएंगे तो यह राजनीति खुद-ब-खुद ही खत्म हो जाएगी। लेकिन तबादलों को ‘चुनावी फंड’ समझने वाले जनप्रतिनिधि ऐसी किसी नीति को धरातल पर आने देंगे इसकी उम्मीद कम ही है। बहरहाल, सरकारी कार्मिक भी जिस तरह से विचारधारा आधारित संगठन बना रहे हैं उसमें तो कार्मिकों व अफसरों पर सियासी बदले की तलवार हर वक्त लटकी रहना तय है।

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