बच्चों की सेहत को खतरा बनता जा रहा बस्ते का बोझ
देश में स्कूल बैग नीति 3 साल पहले लागू हो गई थी, लेकिन राज्य सरकार इसे पूरी तरह लागू करने से बच रही है रोज अपने वजन से ज्यादा का बैग लाद कर स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए निश्चित ही यह खुशखबर है कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में हर शनिवार को बस्ता मुक्त दिन रहेगा। यानी पढ़ाई की बजाय बच्चे स्कूल में शैक्षणेेत्तर गतिविधियों में शामिल होंगे। प्रत्येक शनिवार को बालसभा आयोजन के पुराने फैसले के हश्र को देखते हुए अब इस नवाचार पर सबकी नजरें रहने वाली हैं। यह बात सही है कि बच्चों के कंधों पर बस्ते का वजन लगातार बढ़ रहा है। एनसीईआरटी, एससीईआरटी और सीबीएसई की निर्धारित पुस्तकों से इतर निजी प्रकाशनों की मोटी-मोटी किताबों से कमाई में जुटे स्कूल कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं।
उन्हें सिर्फ पैसा चाहिए, चाहे फीस से आए या फिर किताबों के कमीशन से। बेहतर यह हो कि सरकारी के साथ निजी स्कूलों में भी ऐसा ‘नो बैग डे’ लागू किया जाए ताकि बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्ति मिले। देश में स्कूल बैग नीति तीन साल पहले ही लागू हुई थी, लेकिन स्कूलों की लॉबिंग के आगे राजस्थान सरकार लाचार दिख रही है। राज्य सरकार ने भले ही सरकारी स्कूलों में प्रत्येक शनिवार को ‘नो बैग डे’ घोषित किया है, लेकिन स्कूल बैग पॉलिसी को लागू करने के प्रयास दूर की कौड़ी साबित हो रहे हैं। वजह साफ है, यह व्यवस्था लागू हुई तो निजी स्कूलों को भी नियमों की पालना करनी होगी। नई स्कूल बैग नीति के तहत स्कूल बैग का वजन बच्चों के वजन के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। शिक्षकों को एक दिन पहले ही बताना होगा कि किस दिन कौन सी किताबें लानी हैं, जिससे बच्चों के बस्ते का वजन न बढ़े। चिंता यह है कि बच्चे 12 से 15 किलो तक का बैग लेकर स्कूल की चौथी मंजिल तक चढ़ने को मजबूर हैं।
फ्रंटियर्स इन पेन रिसर्च के मुताबिक देश के 64 फीसदी बच्चे कंधे या मस्कुलोस्केलटल पेन से पीड़ित हैं। बच्चों की पीठ, रीढ़ एवं कमर दर्द आम है। कंधे पर लगातार बोझ से बच्चों की रीढ़ कर्व हो रही है। मगर अभिभावकों की सुनने वाला कोई नहीं। बहुत ज्यादा हुआ तो कमेटी बना दी गई, जिसकी रिपोर्ट कभी आती ही नहीं है। अगर आ भी गई तो सिफारिशें स्कूल-कॉलेजों के पक्ष में होती हैं या फिर रिपोर्ट को समझना मुश्किल होता है। जहां से बच्चों का भविष्य जुड़ा हो, वहां न तो राजनीति हो, न ही सौदेबाजी। बच्चों का भविष्य भी तभी उज्ज्वल होगा, वरना बच्चे जो देखेंगे वहीं करेंगे और फिर हम कुछ नहीं कर पाएंगे। - अरुण कुमार
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