डेरों से गूंजी शिक्षा की अलख, बच्चों ने लिया स्कूल में प्रवेश
ब्यावर. खानाबदोश परिवारों को अपनी आजीविका के लिए जगह बदलनी पड़ती है। ऐसे ही परिवार के बच्चों को शिक्षित करने एवं स्कूल से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं दो युवतियां वेदांशी मंडोरा एवं चंचल गुलबानी। दोनों नियमित रूप से कृषि उपज मंडी परिसर के दक्षिणामुखी हनुमान मंदिर में बच्चों को पढ़ाती हैं और स्कूल में प्रवेश दिलवाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनके इस प्रयास से करीब पचास बच्चे स्कूल में प्रवेश ले चुके हैं तथा अपने-अपने गांवों के स्कूल में पढ़ रहे हैं।
साल में 6 माह गांव में
शहर के उदयपुर रोड पर कुछ परिवार निवास कर रहे हैं जो झाडू बनाकर बेचने का काम करते हैं। यह परिवार छह-सात माह तक यहां पर रहते हैं। यहां पर झाडू बनाकर बेचते हैं। चार-पांच माह तक अपने-अपने गांव चले जाते है। वहां पर झाडू बनाने के लिए खजूर के पत्ते एकत्र करते है। ऐसे में चार माह तक यह खजूर की टहनियों को एकत्र करने में लगे रहते है। यह खजूर की टहनियां एक होने के बाद उन्हें लेकर ब्यावर आ जाते है। यहां पर कृषि उपज मंडी के बाहर झाडू बनाकर बेचने का काम करते है। इस दौरान इनके बच्चे भी यहां आ जाते है। इन परिवारों के बच्चों की संख्या गिनी-चुनी ही होती है। ऐसे में इनकी स्कूली शिक्षा को लेकर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। ऐसे में यह बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते है।
टॉफी बांटने गए, पता चला बच्चे नहीं पढ़ते
वेदांशी बताती हैं कि पांच साल पहले जन्मदिन पर इन बच्चों को टॉफी बांटने गए। इस दौरान ही पता चला कि यह बच्चे पढ़ाई नहीं करते हैं। इसके बाद से ही वेदांशी व चंचल ने इन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। तब से ही यह सिलसिला अनवरत चल रहा है।
पचास बच्चों ने लिया प्रवेश
वेदांशी व चंचल बताती है कि पांच साल में करीब पचास बच्चों को बुनियादी शिक्षा देना शुरू किया। इन्हें स्कूल में प्रवेश लेने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद कुछ बच्चों ने आसीद क्षेत्र व कुछ बच्चों ने भीम क्षेत्र के गांव के विद्यालयों में प्रवेश लिया। जबकि यहां पर रहने वाले बच्चों ने यहां पर प्रवेश लिया। हाल में तीस बच्चों को पढा रहे है। इन्हें भी कुछ दिनों में विद्यालय में प्रवेश दिलवाने के प्रयास शुरू करेंगे।

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