OPINION: प्रिंसिपल पर 27 वार, कटघरे में सिर्फ छात्र नहीं; आखिर चूक कहां हुई?
जरा ठहरकर इस कहानी को देखिए। तेलंगाना के नलगोंडा में एक स्कूल की प्रिंसिपल अपने घर पर थीं। फोन पर बातचीत के दौरान उन्होंने किसी को ‘बाबू’ कहकर संबोधित किया और कुछ ही देर बाद उनकी हत्या कर दी गई। पुलिस जांच के मुताबिक, 27 बार चाकू मारे गए। आरोप किसी गिरोह या पेशेवर हत्यारे पर नहीं, बल्कि उसी स्कूल के दो नाबालिग छात्रों पर है। पुलिस का दावा है कि वारदात के पीछे लूट की योजना, पैसे की जरूरत और पुरानी नाराजगी जैसे पहलू थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कथित तौर पर चाकू और दस्ताने पहले खरीदे गए, घर की रेकी हुई और CCTV पर नजर रखी गई। यानी मामला सिर्फ एक पल के गुस्से का नहीं दिखता।जांच के अनुसार एक छात्र पहले हॉस्टल में रहता था। उसके पास मोबाइल और नकदी मिलने के बाद उसे डे-स्कॉलर किया गया था और पुलिस ने इसे नाराजगी के एक पहलू के रूप में देखा। महंगे शौक, पैसे की चाह और शराब की आदत से जुड़े आरोप भी जांच में आए। एक आरोपी के पास करीब डेढ़ लाख रुपये, आईफोन और अन्य सामान मिलने तथा कुछ नोटों पर खून के निशान मिलने की बात कही गई है। अंतिम पुष्टि जांच और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगी।
यह पहली बार नहीं है जब शिक्षक और छात्र के रिश्ते पर हिंसा का सवाल उठा हो। जुलाई 2025 में हरियाणा के हिसार में निजी स्कूल के प्रिंसिपल जगबीर सिंह पन्नू की स्कूल परिसर में दो नाबालिग छात्रों ने कथित तौर पर चाकू मारकर हत्या कर दी थी। पुलिस की शुरुआती जांच में बाल कटवाने, शर्ट ठीक रखने और स्कूल अनुशासन को लेकर बार-बार टोके जाने की बात सामने आई थी। दोनों घटनाओं के कारण अलग हैं, लेकिन सवाल एक है क्या असहमति कभी इतनी खतरनाक दुश्मनी में बदल सकती है कि शिक्षक भी निशाना बन जाए?यहीं से असली बहस शुरू होनी चाहिए। सिर्फ यह कह देना आसान है कि आज के बच्चे बिगड़ गए हैं। लेकिन आंकड़े ऐसी सरल कहानी की इजाजत नहीं देते। गृह मंत्रालय की ओर से संसद में रखे NCRB आंकड़ों के अनुसार 2022 में कानून से संघर्ष में आए किशोरों से जुड़े 30,555 मामले दर्ज हुए और 37,780 किशोर पकड़े गए। इनमें 16 से 18 वर्ष की उम्र वाले 78.6 प्रतिशत थे। उपलब्ध 2024 के NCRB आंकड़ों के अनुसार किशोर अपराध के मामले 2023 के 31,365 से बढ़कर 2024 में 34,878 हुए और 42,633 किशोर इन मामलों में पकड़े गए। संख्या पूरी पीढ़ी का चरित्र नहीं बताती, लेकिन यह चेतावनी जरूर देती है कि किशोर अपराध को केवल ‘शरारत’ समझकर टालना खतरनाक हो सकता है।
हर गुस्सैल बच्चा अपराधी नहीं होता। खतरा तब बढ़ता है जब गुस्सा, अपमान की भावना, साथियों का दबाव, नशे की शुरुआत, दिखावे की चाह और परिवार से कमजोर संवाद एक साथ जमा होने लगें। किशोर उम्र में जोखिम लेने और साथियों की स्वीकृति पाने की चाह तेज हो सकती है। इसलिए स्कूल को यह पहचानना होगा कि सामान्य असहमति कब चेतावनी में बदल रही है।लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि शिक्षक अनुशासन छोड़ दें। स्कूल में नियम जरूरी हैं। शिक्षक का काम बच्चे को हर गलती पर खुश करना नहीं, बल्कि गलत और सही के बीच सीमा दिखाना है। मोबाइल पर रोक लगाना, अभिभावक को बुलाना या स्कूल के नियम लागू करना अपने आप में गलत नहीं है। सवाल तरीका है। क्या डांट के साथ संवाद है? क्या बच्चे को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है? क्या लगातार नियम तोड़ने वाले छात्र के व्यवहार की वजह समझी जाती है? क्या स्कूल के पास काउंसलर, अभिभावक और शिक्षक के बीच समय पर बातचीत की व्यवस्था है?
कई स्कूलों में चेतावनी और सजा तो मिलती है, लेकिन बच्चे के बदलते व्यवहार पर निगरानी नहीं होती। अगर कोई छात्र अचानक महंगे सामान दिखाए, जरूरत से ज्यादा पैसा खर्च करे, नशे की तरफ जाए, हिंसक भाषा बोले या किसी शिक्षक से असामान्य दुश्मनी पाल ले, तो इसे केवल बदतमीजी समझना ठीक नहीं। ऐसे संकेतों पर परिवार, कक्षा शिक्षक, स्कूल प्रबंधन और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ को साथ बैठना चाहिए।परिवार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। महंगा फोन देखकर सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं कि किसने दिया। यह जानना भी जरूरी है कि बच्चा क्या देख रहा है, किससे बात करता है और किन लोगों के साथ समय बिताता है। हर महंगा शौक अपराध की निशानी नहीं, लेकिन अचानक बदली आदतों को समझना माता-पिता का दायित्व जरूर है। बच्चे को डराकर चुप कराना आसान है; सुरक्षित माहौल देना कठिन है।
नलगोंडा की घटना में ‘बाबू’ जैसा एक शब्द जांच की दिशा बदलने वाला सुराग बन गया। यह सिर्फ अपराध की कहानी नहीं, रिश्ते की कहानी भी है। जिस प्रिंसिपल ने बच्चों को उसी अपनत्व से संबोधित किया, उन्हीं बच्चों पर हत्या का आरोप लगना उस भरोसे की भयावह टूटन है। मगर इस टूटन का जवाब हर छात्र को शक की निगाह से देखना हल नहीं है। अगर स्कूल शिक्षक और छात्र के बीच भरोसा खत्म कर देगा, तो अनुशासन डर बन जाएगा और शिक्षा सिर्फ परीक्षा तक सीमित रह जाएगी।इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘ये कैसे बच्चे हैं?’ सवाल यह होना चाहिए कि ऐसे मोड़ तक पहुंचने से पहले कौन-कौन से संकेत दिखाई दिए और किसने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। स्कूल को सुरक्षा के साथ संवाद चाहिए। परिवार को अनुशासन के साथ अपनापन चाहिए। बच्चे को अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी सीखनी होगी।27 चाकू के वार और एक प्रिंसिपल की मौत हमें झकझोरती है। हिसार की घटना भी चेताती है। लेकिन इन घटनाओं का सबसे बड़ा सबक बच्चों से डरना नहीं है। सबक यह है कि शिक्षा व्यवस्था को बच्चे के अंक से आगे उसके व्यवहार, मानसिक दबाव, संगत और भावनात्मक दुनिया को भी पढ़ना होगा। किताब और कलम हाथ में देने से शिक्षा पूरी नहीं होती। यही सबसे बड़ी चिंता है। बच्चे को यह सिखाना भी जरूरी है कि असहमति में आवाज उठाई जा सकती है, अपमान का जवाब हिंसा नहीं है और गुस्सा चाहे जितना बड़ा हो, किसी इंसान की जिंदगी उससे बड़ी है।
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