8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग में OPS पर आर-पार, कर्मचारियों की मांग से सरकार की बढ़ी मुश्किल
नई दिल्ली: 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की बैठकों का दौर अब उस मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां कर्मचारियों की मांगें सिर्फ वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह गई हैं। चेन्नई में सितंबर की बैठकों के बाद पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस की मांग एक बार फिर सबसे अहम मुद्दों में दिखाई दी है। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें ऐसी पेंशन व्यवस्था चाहिए जिसमें नौकरी खत्म होने के बाद हर महीने मिलने वाली आय को लेकर अनिश्चितता न रहे। दूसरी तरफ सरकार पहले ही नई पेंशन व्यवस्था के भीतर एकीकृत पेंशन योजना यानी यूपीएस ला चुकी है। ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या सरकार पूरी पुरानी पेंशन वापस करेगी या यूपीएस में ही ऐसी राहत देगी जिससे कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता दूर हो सके।पुरानी पेंशन की मांग को समझने के लिए पहले यह देखना जरूरी है कि विवाद शुरू कहां से हुआ। केंद्र सरकार ने एक जनवरी 2004 से सशस्त्र बलों को छोड़कर नए भर्ती होने वाले कर्मचारियों के लिए नई पेंशन व्यवस्था लागू की थी। इसमें कर्मचारी और सरकार दोनों का अंशदान होता है। कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद मिलने वाला लाभ उसके जमा धन और उससे मिलने वाले प्रतिफल से जुड़ता है। कर्मचारी संगठनों को इसी व्यवस्था पर सबसे ज्यादा आपत्ति है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी सरकार की सेवा की, उसकी बुढ़ापे की आय बाजार और निवेश के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।पुरानी पेंशन में तस्वीर अलग थी। इसमें पेंशन का निर्धारण सेवा और अंतिम वेतन से जुड़े नियमों के आधार पर होता था। कर्मचारी के सामने यह अनिश्चितता कम थी कि सेवानिवृत्ति के बाद उसे कितनी नियमित पेंशन मिलेगी। यही निश्चितता अब कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग बन गई है।
सरकार ने इस असंतोष को देखते हुए एकीकृत पेंशन योजना शुरू की। इसमें 25 साल की पात्र सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी के लिए सेवानिवृत्ति से पहले के अंतिम 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत सुनिश्चित पेंशन का प्रावधान है। दस साल या उससे अधिक की पात्र सेवा के बाद कम से कम 10,000 रुपये मासिक सुनिश्चित पेंशन का प्रावधान है। कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को उसकी पेंशन का 60 प्रतिशत पारिवारिक पेंशन के रूप में देने की व्यवस्था है। इन भुगतानों पर महंगाई के अनुसार राहत भी जुड़ी है।फिर भी कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह पुरानी पेंशन का विकल्प नहीं है। उनका तर्क है कि जब पुरानी व्यवस्था में पेंशन सरकारी सेवा से जुड़े निश्चित नियमों के आधार पर मिलती थी, तो नई व्यवस्था में अलग-अलग शर्तों और अंशदान की भूमिका क्यों रखी जाए। यही वजह है कि 8वें वेतन आयोग के सामने पुरानी पेंशन बहाली की मांग अब भी मजबूती से रखी जा रही है।इस मांग का एक नया पहलू सितंबर 2026 में सामने आया है। राष्ट्रीय संयुक्त परामर्श तंत्र से जुड़े कर्मचारी प्रतिनिधियों ने सरकार के कार्मिक विभाग के सामने यह मांग रखी कि ऐसे कर्मचारियों को भी पुरानी पेंशन का लाभ दिया जाए, जिनकी नियुक्ति 2004 के बाद हुई, लेकिन जिन पदों की स्वीकृति 22 दिसंबर 2003 से पहले हो चुकी थी। यानी केवल नियुक्ति की तारीख को आधार न मानकर पद स्वीकृत होने की तारीख को भी देखा जाए। यदि इस मांग पर सहमति बनती है तो कुछ ऐसे कर्मचारी पुरानी पेंशन के दायरे में आ सकते हैं जो अभी नई पेंशन व्यवस्था में हैं।
लेकिन यहां सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल पैसा है। 8वें वेतन आयोग के काम की शर्तों में साफ कहा गया है कि सिफारिश करते समय देश की आर्थिक स्थिति, वित्तीय अनुशासन, विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों तथा गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं की भविष्य की लागत को ध्यान में रखना होगा। इसका सीधा अर्थ है कि आयोग को कर्मचारियों की मांगों के साथ सरकार की लंबे समय की वित्तीय क्षमता भी देखनी होगी।यही कारण है कि पुरानी पेंशन की पूरी वापसी सरकार के लिए आसान फैसला नहीं होगी। इसका असर केवल आज के कर्मचारियों पर नहीं पड़ेगा। आने वाले दशकों में सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों की संख्या, उनकी पेंशन और महंगाई राहत का खर्च सरकारी खजाने पर लगातार आता रहेगा। दूसरी तरफ कर्मचारी संगठन इसे खर्च के बजाय सामाजिक सुरक्षा का अधिकार मानते हैं। यहीं दोनों पक्षों के बीच मूल मतभेद है।वेतन को लेकर भी कर्मचारियों की मांग इस बार काफी बड़ी है। कर्मचारी प्रतिनिधियों ने न्यूनतम मूल वेतन 69,000 रुपये करने और वेतन निर्धारण में 3.833 का गुणक लागू करने का प्रस्ताव रखा है। अभी सातवें वेतन आयोग में न्यूनतम मूल वेतन 18,000 रुपये था। 69,000 रुपये की मांग इसी मौजूदा आधार को करीब 3.83 गुना करने से निकाली गई है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 69,000 रुपये अभी सरकार का तय किया हुआ वेतन नहीं है। यह कर्मचारी पक्ष की मांग है।यही सावधानी 3.83 के गुणक को लेकर भी जरूरी है। सोशल मीडिया पर इसे कई बार संभावित नया गुणक बताकर पेश किया जा रहा है, जबकि आयोग ने अभी इसे स्वीकार नहीं किया है। अंतिम गुणक क्या होगा, यह वेतन आयोग की सिफारिश और उसके बाद केंद्र सरकार की मंजूरी से ही तय होगा।
पेंशनर्स ने भी अपनी मांगों का दायरा काफी बढ़ा दिया है। चेन्नई में हुई बैठक में पेंशन को अंतिम वेतन के 67 प्रतिशत तक करने, न्यूनतम मूल वेतन 69,000 रुपये रखने और 3.833 के गुणक की मांग सामने आई। इसके साथ सभी केंद्रीय पेंशनर्स के लिए समान पद और सेवा के आधार पर पेंशन व्यवस्था, पेंशन और पारिवारिक पेंशन पर कर राहत तथा पेंशन की एकमुश्त कटौती की भरपाई की अवधि कम करने जैसी मांगें भी रखी गईं।पेंशन की एकमुश्त कटौती का मुद्दा भी पुराना है। सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी अपनी पेंशन का एक हिस्सा एकमुश्त ले सकता है, जिसके बदले नियमित पेंशन में कटौती होती है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जिस अवधि में यह राशि वसूल हो जाती है, उसके बाद भी लंबे समय तक कटौती जारी रखना उचित नहीं है। इसलिए इस अवधि को 15 साल से घटाकर 11 साल करने की मांग रखी गई है।इस पूरी बहस में पुराने पेंशनर्स का सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है। करीब 69 लाख ऐसे पेंशनर्स और पारिवारिक पेंशनर्स को लेकर चिंता जताई गई है जो एक जनवरी 2026 से पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पेंशनर संगठनों को आशंका है कि 8वें वेतन आयोग की शर्तों में पुराने पेंशनर्स के बारे में पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार साफ करे कि नए वेतन आयोग के पेंशन संबंधी लाभ पुराने पेंशनर्स को भी किस तरह मिलेंगे।यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि नए और पुराने पेंशनर्स के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ तो समानता को लेकर नया विवाद खड़ा हो सकता है। पेंशनर्स का तर्क है कि केवल सेवानिवृत्ति की तारीख अलग होने के कारण समान सेवा करने वाले दो लोगों के पेंशन लाभ में बहुत बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए।
एक और मांग सामने आई है सिविल कर्मचारियों के लिए एक पद, एक पेंशन जैसी व्यवस्था। हालांकि इसे लागू करना आसान नहीं होगा। सेना में समान रैंक और समान सेवा अवधि को आधार बनाकर पेंशन व्यवस्था बनाई जा सकती है, लेकिन सिविल सेवाओं में विभाग, पद, संवर्ग, नियुक्ति वर्ष और सेवा नियम अलग-अलग हैं। इसलिए सेना की व्यवस्था को उसी रूप में सरकारी कर्मचारियों पर लागू करना कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर जटिल हो सकता है।अब नजर 8वें वेतन आयोग की आगे की बैठकों पर है। आयोग ने सितंबर में चेन्नई में 7 और 8 तारीख को बैठकें कीं। इसके बाद 16, 17 और 18 सितंबर को चंडीगढ़ में कर्मचारी, पेंशनर और दूसरे पक्षों से बातचीत का कार्यक्रम है। अक्टूबर में बेंगलुरु में भी बैठकें निर्धारित हैं। यानी कर्मचारियों की मांगें अभी अंतिम चरण में नहीं पहुंची हैं, बल्कि आयोग विभिन्न पक्षों की राय जुटा रहा है।आयोग का गठन तीन नवंबर 2025 को हुआ था और उसे अपनी सिफारिशें देने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। इसलिए अभी वेतन या पेंशन के किसी भी आंकड़े को अंतिम मान लेना जल्दबाजी होगी। आयोग के सामने मांगें हैं, सुझाव हैं और सरकार की अपनी वित्तीय सीमाएं हैं। अंतिम फैसला इन सभी के बीच संतुलन से निकलेगा।
तो क्या पुरानी पेंशन वापस आएगी? मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो पूरी पुरानी पेंशन व्यवस्था की वापसी आसान नहीं दिखाई देती। सरकार पहले ही एकीकृत पेंशन योजना के जरिए निश्चित पेंशन का तत्व जोड़ चुकी है। दूसरी तरफ 8वें वेतन आयोग की शर्तें सरकार की वित्तीय स्थिति और भविष्य की पेंशन लागत को गंभीरता से देखने का संकेत देती हैं। ऐसे में सरकार के लिए एक रास्ता यह हो सकता है कि वह एकीकृत पेंशन योजना में और सुधार करे, पात्रता और लाभों को बेहतर बनाए तथा कर्मचारियों की निश्चित आय से जुड़ी चिंता को और कम करे।लेकिन कर्मचारियों के लिए मामला केवल गणित का नहीं है। 69,000 रुपये वेतन की मांग हो या 3.83 का गुणक, 67 प्रतिशत पेंशन की मांग हो या पुरानी पेंशन की वापसी इन सभी के पीछे एक ही चिंता दिखाई देती है। कर्मचारी चाहता है कि नौकरी खत्म होने के बाद उसकी आर्थिक सुरक्षा कमजोर न पड़े।यही वजह है कि 8वां वेतन आयोग इस बार सिर्फ वेतन बढ़ाने वाला आयोग नहीं है। इसके फैसले आने वाले वर्षों में सरकारी कर्मचारियों की कमाई, पेंशन और बुढ़ापे की आर्थिक सुरक्षा का ढांचा तय करेंगे। सरकार के सामने चुनौती यह है कि कर्मचारियों की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं, जबकि सरकारी खजाने की अपनी सीमाएं हैं।फिलहाल 69,000 रुपये न्यूनतम वेतन तय नहीं हुआ है। 3.83 का गुणक तय नहीं हुआ है। 67 प्रतिशत पेंशन भी तय नहीं हुई है और पुरानी पेंशन की वापसी पर भी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ये सभी मांगें हैं, जिन पर आयोग विचार कर रहा है।लेकिन एक बात जरूर साफ हो गई है इस बार कर्मचारियों की लड़ाई केवल ज्यादा वेतन की नहीं है। वे अपने पूरे सेवाकाल के बाद मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा का भरोसा चाहते हैं। और 8वें वेतन आयोग के सामने सबसे कठिन सवाल शायद यही है कि उस भरोसे की कीमत कितनी होगी और उसका बोझ कौन उठाएगा।
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