OPINION: किताबें छूटीं, स्क्रीन बढ़ी और उम्मीदों के बोझ तले दबे बच्चे
स्कूल की घंटी बजती है, बच्चे कक्षा में बैठते हैं, किताबें खुलती हैं, लेकिन कई चेहरों के पीछे दूसरी दुनिया चल रही होती है। उंगलियां कॉपी पर होती हैं, मन मोबाइल की स्क्रीन, छोटे वीडियो, गेम, चैट और तुरंत मिलने वाले जवाबों में भटक रहा होता है। यह उस शिक्षा की कहानी है जिसमें सुविधा बढ़ी, लेकिन ठहरकर पढ़ने, सोचने और असफल होकर फिर कोशिश करने की आदत कमजोर पड़ने लगी। बच्चों की शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग समस्याएं मानना भूल होगी।कोविड के समय ऑनलाइन पढ़ाई जरूरी थी। लाखों बच्चों के लिए मोबाइल, लैपटॉप और इंटरनेट ने पढ़ाई को टूटने से बचाया। लेकिन आपातकाल में अपनाया गया तरीका धीरे-धीरे सामान्य जीवन का हिस्सा बन गया। ASER 2024 में 14 से 16 वर्ष के ग्रामीण बच्चों के डिजिटल व्यवहार की पहली प्रतिनिधिक तस्वीर सामने आई। सर्वे में 6.5 लाख से अधिक बच्चे और 600 से ज्यादा जिले शामिल थे। इस आयु वर्ग में 82.2 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि वे स्मार्टफोन इस्तेमाल करना जानते हैं। करीब 57 प्रतिशत ने पिछले सप्ताह किसी शैक्षणिक काम के लिए स्मार्टफोन इस्तेमाल किया, जबकि 76 प्रतिशत ने सोशल मीडिया का उपयोग किया। यह तकनीक के खिलाफ फैसला नहीं है; यह बताता है कि शिक्षा को बच्चों को डिजिटल दुनिया का समझदार उपयोग सिखाना होगा।लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा ज्यादा गंभीर है। कक्षा 3 में सरकारी स्कूलों के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे 2024 में कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पा रहे थे। सुधार हुआ है, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ। पढ़ने की क्षमता शिक्षा की बुनियाद है। बच्चा पाठ पढ़कर अर्थ नहीं समझ सकता तो इंटरनेट पर मिली सौ सूचनाएं भी उसके लिए ज्ञान नहीं बनतीं। इसलिए स्क्रीन के दौर में किताब की जरूरत कम नहीं, बल्कि और बढ़ गई है मोबाइल ने ज्ञान को आसान बनाया है, लेकिन मेहनत को नहीं। बच्चे को उत्तर तुरंत मिल जाता है, इसलिए वह उत्तर तक पहुंचने की प्रक्रिया से बचने लगता है। वीडियो देखकर अध्याय समझ लेने का भ्रम पैदा हो सकता है, जबकि लिखने, पढ़ने, याद रखने और अपने शब्दों में समझाने का अभ्यास पीछे छूट जाता है। शिक्षा में असली उपलब्धि यह नहीं कि बच्चे ने कितनी सामग्री देखी; उपलब्धि यह है कि वह बिना स्क्रीन के कितना समझा और उस ज्ञान से नया सवाल कितना बना सकता है।
जोधपुर के शिक्षाविदों की चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है। सेवानिवृत्त जिला शिक्षा अधिकारी विद्योत्तमा वर्मा ने परीक्षा और लक्ष्य के दबाव को बच्चों के टूटने से जोड़ा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में 10 से 19 वर्ष के हर सात में लगभग एक किशोर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना करता है। चिंता और अवसाद पढ़ाई, उपस्थिति और सामाजिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर तनाव आत्मघाती खतरे में बदलता है, लेकिन लगातार दबाव, अकेलापन, असफलता का डर और सहायता का अभाव जोखिम बढ़ा सकते हैं। UNICEF India की 2024 की सेवा-मैपिंग रिपोर्ट ने बच्चों और किशोरों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े अंतर की ओर ध्यान दिलाया है। समस्या केवल विशेषज्ञों की संख्या नहीं है। उससे पहले समस्या यह है कि बच्चे की परेशानी को पहचानने वाला कौन है। घर में चिड़चिड़ापन बदतमीजी समझ लिया जाता है, स्कूल में ध्यान की कमी को आलस्य कहा जाता है और गिरते अंक को क्षमता का प्रमाण मान लिया जाता है। यही नजरिया बदलना होगा।अभिभावकों की भूमिका सबसे निर्णायक है। बच्चा माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए पैदा नहीं हुआ। डॉक्टर का बच्चा डॉक्टर बने, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बने या परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुसार करियर चुने, यह जरूरी नहीं। प्रवीण मैढ़ की बात महत्वपूर्ण है कि बच्चे की रुचि और योग्यता पहचानी जाए। करियर का चुनाव क्षमता, रुचि, स्वभाव और अवसरों को देखकर होना चाहिए, न कि रिश्तेदारों की तुलना और समाज की अपेक्षा से।शिक्षकों के सामने भी आसान रास्ता नहीं है। कमजोर बच्चे को कक्षा की गति के साथ चलाने के लिए केवल अतिरिक्त होमवर्क देना पर्याप्त नहीं। शिक्षक को पहले यह जानना होगा कि बच्चा कहां अटका है। छोटे लक्ष्य, स्तर के अनुसार अभ्यास, पढ़ने की नियमित गतिविधियां और व्यक्तिगत प्रतिक्रिया अधिक उपयोगी हो सकती हैं। कक्षा में ऐसा वातावरण बने जहां बच्चा गलत उत्तर देने से न डरे। डर सीखने की सबसे बड़ी दीवार है।
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंदा मैढ़ ने किताबों की ओर लौटने की बात कही है। इसे पुरानी शिक्षा व्यवस्था की बात समझना ठीक नहीं होगा। पुस्तक बच्चे को एक विचार के साथ समय बिताना सिखाती है। वह अधूरी जानकारी के साथ जूझने, संदर्भ समझने और निष्कर्ष तक पहुंचने का धैर्य देती है। स्कूलों में रोज 20 मिनट का शांत पठन, पुस्तक चर्चा, कहानी लेखन और पुस्तकालय आधारित गतिविधियां लंबे समय में ध्यान मजबूत कर सकती हैं।दुनिया भी इसी संतुलन की तलाश में है। UNESCO के अनुसार मार्च 2026 तक 114 शिक्षा प्रणालियों में स्कूलों में मोबाइल फोन पर राष्ट्रीय प्रतिबंध या समान नियंत्रण लागू हो चुके थे, जो दुनिया के 58 प्रतिशत शिक्षा तंत्रों के बराबर है। भारत के कई राज्यों और शहरों में भी मोबाइल उपयोग सीमित किया गया है। लेकिन केवल फोन छीन लेना पर्याप्त नहीं। तकनीक का उपयोग तभी होना चाहिए जब वह सीखने के उद्देश्य को मजबूत करे। बच्चे को डिजिटल दुनिया से काटना नहीं, उसमें विवेक के साथ चलना सिखाना है।समाधान तीन स्तरों पर चाहिए। घर में स्क्रीन का समय तय हो, सोने से पहले फोन दूर रखा जाए और भोजन के समय बातचीत हो। स्कूल में मोबाइल के स्पष्ट नियम हों, साथ ही डिजिटल साक्षरता भी सिखाई जाए। कक्षा में किताब, चर्चा, लेखन, खेल और प्रयोग को स्क्रीन के बराबर महत्व मिले। मानसिक स्वास्थ्य सहायता को संकट आने के बाद की व्यवस्था न मानकर स्कूल संस्कृति का हिस्सा बनाया जाए।सबसे जरूरी है भाषा बदलना। बच्चे से यह पूछने के बजाय कि कितने अंक आए, पूछा जाए कि आज क्या नया सीखा। यह पूछने के बजाय कि दूसरा बच्चा तुमसे आगे कैसे निकल गया, पूछा जाए कि तुम्हें किस जगह मदद चाहिए। शिक्षक को केवल पाठ पूरा करने वाला कर्मचारी नहीं, मार्गदर्शक बनना होगा और अभिभावक को केवल परिणाम देखने वाला निरीक्षक नहीं, भरोसे का पहला ठिकाना बनना होगा।बच्चों को मोबाइल से बचाने की लड़ाई उन्हें मोबाइल से दूर करने की लड़ाई नहीं है। यह उन्हें इतना मजबूत बनाने की लड़ाई है कि मोबाइल उनके हाथ में रहे, लेकिन उनका ध्यान उसकी मुट्ठी में न रहे। किताबें लौटें, खेल लौटे, बातचीत लौटे, असफल होने की गुंजाइश लौटे और सीखने में आनंद लौटे। तभी शिक्षा अंक बनाने की मशीन से निकलकर इंसान बनाने की प्रक्रिया बनेगी।
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