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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

OPINION:शिक्षक की योग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त बच्चों के भविष्य से समझौता आखिर कब तक?

 

OPINION:शिक्षक की योग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त बच्चों के भविष्य से समझौता आखिर कब तक?

OPINION:शिक्षक की योग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त बच्चों के भविष्य से समझौता आखिर कब तक?

शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। स्कूल की इमारत कितनी भी अच्छी हो, किताबें कितनी भी आधुनिक हों और तकनीक कितनी भी बेहतर क्यों न हो, अगर कक्षा में पढ़ाने वाला शिक्षक अपनी जिम्मेदारी के लिए निर्धारित योग्यता ही पूरी नहीं करता तो पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जा सकती और न ही उनकी सेवा जारी रखी जा सकती है, जिनके पास संबंधित कानूनों के तहत निर्धारित आवश्यक योग्यता नहीं है। यह आदेश असम में शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों के कर्मचारियों के सरकारीकरण से जुड़ी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान आया।पहली नजर में यह मामला असम तक सीमित दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश छिपा है। सवाल केवल यह नहीं है कि किसी शिक्षक के पास डिग्री है या नहीं। असली सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को बच्चों की बुनियादी शिक्षा, उनके सीखने की क्षमता और उनके भविष्य को दिशा देने की जिम्मेदारी दी जा रही है, क्या उसके चयन की प्रक्रिया पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और निर्धारित मानकों के अनुरूप है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस बात पर जोर दिया है, वह शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है नियमों से समझौता करके शिक्षक नियुक्त करने का रास्ता आखिर कब तक स्वीकार किया जा सकता है?

अदालत के सामने जिस मामले की सुनवाई हुई, उसमें आरोप यह था कि कुछ व्यवस्थाओं के जरिए शिक्षकों और कर्मचारियों को बिना निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया से गुजरे सरकारी सेवा में शामिल करने का रास्ता बनाया जा सकता है। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि यदि किसी व्यक्ति के पास कानून और संबंधित वैधानिक संस्थाओं द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता नहीं है तो उसे शिक्षक के रूप में नियुक्त या सरकारी सेवा में शामिल कैसे किया जा सकता है। अदालत ने फिलहाल अंतरिम व्यवस्था के तौर पर आवश्यक योग्यता के बिना नियुक्ति या सेवा जारी रखने पर रोक लगाने का निर्देश दिया है।यहां एक बात समझना जरूरी है। शिक्षक की योग्यता का मतलब केवल परीक्षा पास कर लेना नहीं है। स्कूल स्तर पर शिक्षक बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता के साथ शिक्षक प्रशिक्षण और पात्रता से जुड़े मानक भी महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 23 के तहत शिक्षक नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने की व्यवस्था है और इसी ढांचे में एनसीटीई की भूमिका आती है। उच्च शिक्षा के स्तर पर संबंधित पदों के लिए यूजीसी और लागू नियमों का पालन करना होता है। यानी शिक्षक की योग्यता कोई मनमाना प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक वैधानिक ढांचा मौजूद है।यही वजह है कि इस आदेश को केवल एक राज्य की भर्ती व्यवस्था से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। देश में शिक्षक की कमी लंबे समय से एक गंभीर समस्या रही है। हालिया आंकड़ों में कई राज्यों में हजारों नहीं बल्कि लाखों शिक्षक पद खाली होने की तस्वीर सामने आई है। बिहार में ही प्राथमिक स्तर पर दो लाख से अधिक और माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर भी हजारों पद खाली बताए गए हैं। ऐसी स्थिति में सरकारों के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ खाली पदों को जल्द भरना जरूरी है और दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि जल्दबाजी में ऐसे लोगों की नियुक्ति न हो जो निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करते।

यहीं से शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी दुविधा शुरू होती है। अगर शिक्षक कम हैं तो कक्षाएं प्रभावित होंगी, बच्चों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है। लेकिन अगर शिक्षकों की कमी दूर करने के नाम पर योग्यता के मानकों को ही कमजोर कर दिया जाए तो इसका नुकसान और बड़ा हो सकता है। क्योंकि एक खाली पद को कुछ समय के लिए दूसरे तरीके से संभाला जा सकता है, लेकिन कमजोर शिक्षा की भरपाई बच्चे के जीवन के बाद के वर्षों में आसानी से नहीं होती।उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस फैसले की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां शिक्षक भर्ती, टीईटी और पात्रता को लेकर लगातार बहस चलती रहती है। प्रदेश में शिक्षक भर्ती के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि एक तरफ लाखों युवा निर्धारित योग्यता हासिल करने के लिए परीक्षा देते हैं, प्रशिक्षण लेते हैं और पात्रता परीक्षा पास करते हैं, वहीं दूसरी तरफ किसी अन्य व्यवस्था के जरिए बिना समान प्रक्रिया के नियुक्ति का रास्ता खुलता है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे। भर्ती व्यवस्था में सबसे जरूरी चीज केवल पदों की संख्या नहीं, बल्कि समान अवसर और भरोसा है।टीईटी को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट का रुख पहले से स्पष्ट रहा है। केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में संसद में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले में टीईटी को आरटीई कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यताओं में शामिल माना गया है। इसके बाद मई 2026 में समीक्षा याचिकाओं का निपटारा करते हुए शिक्षकों को टीईटी योग्यता हासिल करने के लिए समयसीमा 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी गई। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारों को टीईटी नियमित रूप से कराने का प्रयास करना चाहिए, बेहतर होगा कि साल में दो बार परीक्षा आयोजित हो ताकि शिक्षकों को योग्यता हासिल करने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। शिक्षक की योग्यता सुनिश्चित करना केवल शिक्षक पर जिम्मेदारी डाल देना नहीं है। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें शिक्षक को पात्रता पूरी करने का पर्याप्त अवसर मिले। अगर कोई परीक्षा साल में एक बार होती है, परिणाम में देरी होती है और फिर अगली प्रक्रिया के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है तो इसका सीधा असर शिक्षक और शिक्षा दोनों पर पड़ता है। इसलिए गुणवत्ता और अवसर दोनों को साथ लेकर चलना होगा।आज देश में शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे अभ्यर्थियों की है जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। वे बीएड, डीएलएड जैसी आवश्यक योग्यताएं पूरी करते हैं, टीईटी जैसी परीक्षाएं देते हैं और फिर भर्ती विज्ञापन का इंतजार करते हैं। ऐसे अभ्यर्थियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश महत्वपूर्ण है कि शिक्षक भर्ती में वैधानिक योग्यता और नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की उम्मीद मजबूत होती है।लेकिन यहां सरकारों के लिए भी एक संदेश है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि योग्य शिक्षक ही नियुक्त किए जाएंगे। योग्य शिक्षकों की उपलब्धता के लिए समय पर भर्ती भी करनी होगी। अगर हजारों पद वर्षों तक खाली रहते हैं तो इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। दिल्ली में हाल ही में 10,417 शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा और 613 विशेष शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान इसी समस्या के एक अलग उदाहरण को दिखाता है। वहां शिक्षा के लिए 2026-27 में 19,148 करोड़ रुपये का बजट भी रखा गया है।

इसलिए शिक्षक गुणवत्ता की बहस को केवल 'योग्य बनाम अयोग्य' के सवाल तक सीमित करना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि देश की शिक्षा व्यवस्था किस तरह ऐसा संतुलन बनाए जिसमें योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिले, खाली पद समय पर भरें जाएं, बच्चों को पर्याप्त शिक्षक मिलें और नियुक्ति प्रक्रिया पर किसी को संदेह न रहे। भर्ती में पारदर्शिता, समयबद्ध परीक्षा, जल्दी परिणाम और समय पर नियुक्ति ये चारों चीजें एक साथ जरूरी हैं।सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उन लोगों के लिए भी संदेश स्पष्ट है जो शिक्षक की नौकरी को केवल सरकारी सेवा पाने का माध्यम मानते हैं। शिक्षक होना सामान्य नौकरी नहीं है। एक शिक्षक के सामने रोज ऐसे बच्चे बैठते हैं जिनके सीखने, सोचने और आगे बढ़ने पर उसके काम का असर पड़ता है। इसलिए शिक्षक बनने के लिए निर्धारित योग्यता को बोझ या औपचारिकता समझना शिक्षा व्यवस्था के साथ अन्याय होगा।दूसरी तरफ सरकारों को भी यह समझना होगा कि केवल नियम बनाकर जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। यदि योग्य शिक्षकों की कमी है तो भर्ती की प्रक्रिया तेज करनी होगी। यदि टीईटी जरूरी है तो परीक्षा नियमित करनी होगी। यदि प्रशिक्षण जरूरी है तो प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी। और यदि किसी पुराने कर्मचारी को सेवा में बनाए रखने के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत है तो वह व्यवस्था भी कानून और समान अवसर के सिद्धांत के अनुरूप होनी चाहिए।

अंततः इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिक्षा व्यवस्था का केंद्र कौन है भर्ती प्रक्रिया, सरकारी विभाग या शिक्षक? वास्तव में केंद्र में बच्चा होना चाहिए। शिक्षक की नियुक्ति से लेकर उसकी योग्यता और प्रशिक्षण तक हर फैसला अंततः बच्चे के भविष्य को ध्यान में रखकर होना चाहिए। अगर किसी व्यवस्था में नियमों का पालन नहीं होता तो नुकसान केवल सरकारी रिकॉर्ड में नहीं दिखता, उसका असर उस बच्चे पर पड़ता है जो कई वर्षों तक कमजोर शिक्षा के साथ आगे बढ़ता है।सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने बहस को एक बुनियादी सवाल पर वापस ला दिया है बच्चों को पढ़ाने वाला व्यक्ति खुद निर्धारित मानकों पर कितना खरा उतरता है? इस सवाल का जवाब केवल अदालत या सरकार को नहीं देना है। पूरी शिक्षा व्यवस्था को देना है। शिक्षक की कमी दूर करनी है तो तेजी से भर्ती कीजिए, युवाओं को अवसर देना है तो समय पर परीक्षा कराइए, लेकिन गुणवत्ता के साथ समझौता मत कीजिए। क्योंकि स्कूल में एक योग्य शिक्षक की मौजूदगी सिर्फ एक पद भरना नहीं है, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करना है।

OPINION:शिक्षक की योग्यता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त बच्चों के भविष्य से समझौता आखिर कब तक? Rating: 4.5 Diposkan Oleh: UP BASIC NEWS

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