UP Election 2027: डिग्री और नौकरी के बीच फंसा युवा क्या इस बार खुद तय करेगा चुनावी एजेंडा?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन चुनावी राजनीति की दिशा धीरे-धीरे साफ होने लगी है। इस बार की लड़ाई सिर्फ पुराने राजनीतिक समीकरणों तक सीमित रहेगी या युवा मतदाता इसे नए मुद्दों की तरफ मोड़ेंगे, यह सवाल अब महत्वपूर्ण होता जा रहा है। प्रदेश की करीब 100 विधानसभा सीटों पर युवा मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है। राजनीतिक दलों का ध्यान Gen-Z यानी नई युवा पीढ़ी पर बढ़ रहा है और इसके पीछे सिर्फ संख्या का गणित नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, डिजिटल सुविधाओं और बेहतर भविष्य की उनकी उम्मीदें भी हैं।युवा मतदाता को लंबे समय से चुनावी राजनीति में एक बड़े वोट बैंक के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन आज का युवा केवल जाति, क्षेत्र या पारंपरिक राजनीतिक पहचान के आधार पर फैसला करने वाला मतदाता नहीं है। उसके सामने अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं, नौकरी, कौशल और करियर से जुड़े सवाल हैं। किसी के हाथ में डिग्री है तो किसी के पास शिक्षक बनने की तैयारी का अनुभव, कोई सरकारी नौकरी के लिए वर्षों से परीक्षा दे रहा है तो कोई निजी क्षेत्र में बेहतर अवसर तलाश रहा है। यही वजह है कि 2027 का चुनाव आते-आते शिक्षा और रोजगार की बहस को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश में शिक्षक भर्ती और टीईटी से जुड़े हालिया घटनाक्रम इस बदलती तस्वीर को समझने के लिए पर्याप्त हैं। इसी दिन प्रदेश में टीजीटी के 17,740 और पीजीटी के 2,615 पदों की भर्ती से जुड़ी प्रक्रिया सामने आई है। कुल मिलाकर 20,355 पदों की यह भर्ती उन युवाओं के लिए बड़ी उम्मीद है जो लंबे समय से शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन भर्ती के साथ नियम और आरक्षण को लेकर सवाल भी सामने आए हैं। इसका मतलब साफ है कि युवा सिर्फ भर्ती की घोषणा नहीं चाहता। वह यह भी जानना चाहता है कि प्रक्रिया कब पूरी होगी, परीक्षा कब होगी, परिणाम कब आएगा और नियुक्ति आखिर कब मिलेगी।यही वह बदलाव है जिसे राजनीतिक दलों को समझना होगा। युवा अब सिर्फ यह सुनना नहीं चाहता कि सरकार ने कितनी नौकरियां दीं। वह पूछेगा कि कितने पद खाली हैं, कितने पदों पर भर्ती हुई, कितनी परीक्षाएं समय पर हुईं और कितने अभ्यर्थियों को वास्तव में नौकरी मिली। रोजगार की राजनीति अब सिर्फ सरकारी नौकरी की घोषणा तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें परीक्षा व्यवस्था, भर्ती की पारदर्शिता, कौशल विकास, निजी रोजगार और स्वरोजगार जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे।
उत्तर प्रदेश में यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या है। प्रयागराज जैसे शहर वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का प्रमुख केंद्र रहे हैं। आज भी शिक्षक भर्ती से लेकर दूसरी सरकारी नौकरियों तक के लिए युवा लंबे समय तक तैयारी करते हैं। हाल ही में टीजीटी अभ्यर्थियों का प्रयागराज में प्रदर्शन भी सामने आया, जिसमें जीव विज्ञान को विज्ञान के बराबर पद देने की मांग की गई। यह सिर्फ एक विषय के पदों का विवाद नहीं है। इसके पीछे उस युवा की बेचैनी है जिसने अपनी पढ़ाई और करियर की दिशा किसी सरकारी भर्ती की उम्मीद में तय की है।शिक्षा और रोजगार के बीच यही संबंध 2027 की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। अगर कोई युवा बीएड या अन्य शिक्षक प्रशिक्षण पूरा करने के बाद टीईटी पास करता है, फिर भर्ती का इंतजार करता है और वर्षों बाद भी नियुक्ति नहीं मिलती तो उसके लिए शिक्षा व्यवस्था और रोजगार व्यवस्था अलग-अलग मुद्दे नहीं रह जाते। दोनों एक ही सवाल में बदल जाते हैं पढ़ाई के बाद भविष्य क्या है?
टीईटी को लेकर मौजूदा घटनाक्रम इस चिंता को और स्पष्ट करता है। उत्तर प्रदेश में हाल ही में टीईटी पास करने वाले शिक्षक भी विशेष टीईटी का फॉर्म भर रहे हैं। इसकी वजह उन्हें अपने पहले परिणाम में बदलाव की आशंका बताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 55 हजार अभ्यर्थी परिणाम से संबंधित प्रत्यावेदन दे चुके हैं और 10 सितंबर इसकी अंतिम तारीख बताई गई है। जब पहले से टीईटी पास कर चुके शिक्षक दोबारा परीक्षा देने को मजबूर महसूस करते हैं तो यह सिर्फ परीक्षा का मामला नहीं रह जाता। यह परीक्षा और परिणाम की विश्वसनीयता का सवाल भी बन जाता है।यही सवाल युवा मतदाता के राजनीतिक व्यवहार को बदल सकता है। जिस युवा ने परीक्षा के लिए सालों मेहनत की है, वह चुनाव में सिर्फ बड़े राजनीतिक नारों को नहीं देखेगा। वह अपने अनुभव से सरकार को मापेगा। परीक्षा समय पर हुई या नहीं, पेपर सुरक्षित रहा या नहीं, परिणाम में देरी हुई या नहीं, भर्ती अदालत में अटकी या नहीं और नियुक्ति के बाद सेवा से जुड़े विवाद कितने समय में सुलझे ये सभी बातें उसके राजनीतिक फैसले का हिस्सा बन सकती हैं।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल रोजगार या शिक्षा के मुद्दे पर ही युवा वोट करेगा। उत्तर प्रदेश का चुनाव हमेशा कई मुद्दों का मिश्रण रहा है। कानून-व्यवस्था, विकास, महंगाई, सामाजिक योजनाएं, बुनियादी सुविधाएं और स्थानीय समस्याएं भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगी। लेकिन युवाओं की बढ़ती संख्या इन सभी मुद्दों के बीच शिक्षा और रोजगार को एक महत्वपूर्ण चुनावी सवाल जरूर बना सकती है।Gen-Z के सामने एक और महत्वपूर्ण बदलाव डिजिटल दुनिया का है। आज का युवा राजनीतिक दलों के भाषण और विज्ञापन तक सीमित नहीं है। वह सोशल मीडिया पर नेताओं के पुराने बयान खोज सकता है, सरकारी आंकड़ों की तुलना कर सकता है और दूसरे राज्यों की नीतियों से अपने राज्य की तुलना कर सकता है। इसलिए केवल प्रचार के जरिए युवा मतदाता को प्रभावित करना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है। उसे आंकड़े और जमीन पर दिखाई देने वाला काम दोनों चाहिए।रोजगार मेलों और निजी क्षेत्र में अवसर पैदा करने की कोशिशें भी इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जिलों में रोजगार मेलों के जरिए युवाओं को निजी कंपनियों में अवसर देने की पहल जारी है। अलीगढ़ में आठ सितंबर को आयोजित रोजगार मेले में 2,000 से अधिक पदों की जानकारी सामने आई, जबकि नोएडा में 10 सितंबर को महिलाओं के लिए विशेष रोजगार मेले में करीब 30 कंपनियों के जरिए 2,000 से अधिक अवसर देने की बात कही गई है।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। क्या रोजगार मेले में कुछ हजार युवाओं को नौकरी मिल जाना प्रदेश की करोड़ों की युवा आबादी की समस्या का स्थायी समाधान है? शायद नहीं। रोजगार मेले तत्काल अवसर दे सकते हैं, लेकिन युवाओं के लिए स्थायी रोजगार नीति के लिए शिक्षा से लेकर कौशल प्रशिक्षण और उद्योगों तक व्यापक योजना जरूरी होगी। यही वह विषय है जिसे चुनावी घोषणा पत्रों में केवल एक-दो पंक्तियों में समेटना मुश्किल होगा।राजनीतिक दलों के लिए असली चुनौती यह है कि वे युवाओं से सिर्फ यह न कहें कि उनके लिए बहुत कुछ किया गया है, बल्कि यह भी बताएं कि अगले पांच साल में क्या किया जाएगा। क्या हर साल सरकारी भर्तियों का कैलेंडर जारी होगा? क्या रिक्त पदों की संख्या सार्वजनिक की जाएगी? क्या परीक्षा और परिणाम के लिए समयसीमा तय होगी? क्या पेपर लीक रोकने के लिए तकनीकी व्यवस्था मजबूत होगी? क्या निजी क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार पैदा करने के लिए उद्योग नीति और शिक्षा नीति को जोड़ा जाएगा? क्या कॉलेज की डिग्री को रोजगार से जोड़ने के लिए कौशल आधारित पाठ्यक्रम बढ़ाए जाएंगे?युवा मतदाता के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल होंगे। वह यह भी पूछ सकता है कि अगर सरकार रोजगार नहीं दे सकती तो क्या वह ऐसा आर्थिक वातावरण बना सकती है जिसमें निजी क्षेत्र बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा करे। अगर सरकारी नौकरी सीमित है तो क्या युवाओं को उद्यमिता, फ्रीलांसिंग, तकनीकी कौशल और नए रोजगार क्षेत्रों के लिए तैयार किया जा रहा है। इस लिहाज से शिक्षा नीति और रोजगार नीति को अलग-अलग देखने की पुरानी सोच बदलनी होगी।
2027 का चुनाव इसलिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन या सत्ता की वापसी का चुनाव नहीं होगा। यह राजनीतिक दलों के लिए नई पीढ़ी को समझने की परीक्षा भी हो सकता है। जिस युवा के सामने मोबाइल पर पूरी दुनिया उपलब्ध है, वह अपने राज्य की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था की तुलना दूसरे राज्यों और दूसरे देशों से भी करता है। उसकी अपेक्षाएं भी पहले से अलग हैं। वह केवल सरकारी नौकरी नहीं चाहता, वह अवसर चाहता है।यही कारण है कि करीब 100 विधानसभा सीटों पर युवा मतदाताओं की संभावित निर्णायक भूमिका को केवल चुनावी आंकड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे लाखों व्यक्तिगत कहानियां हैं किसी की प्रतियोगी परीक्षा, किसी की बेरोजगारी, किसी की अधूरी भर्ती, किसी की पहली नौकरी और किसी का अपना कारोबार शुरू करने का सपना।आने वाले महीनों में राजनीतिक दल युवाओं के लिए कई घोषणाएं कर सकते हैं। कोई नई भर्ती का वादा करेगा, कोई रोजगार योजना की बात करेगा, कोई कौशल विकास पर जोर देगा और कोई शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की बात करेगा। लेकिन अंततः युवा मतदाता के सामने एक सीधा सवाल रहेगा घोषणा के बाद परिणाम क्या मिला?
यही 2027 की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। युवा अब केवल चुनावी भाषण का हिस्सा नहीं रहना चाहता। वह यह तय करना चाहता है कि उसके भविष्य पर चर्चा कैसे होगी। डिग्री के बाद नौकरी, परीक्षा के बाद परिणाम और चयन के बाद नियुक्ति इन तीनों के बीच जो लंबा इंतजार है, अगर राजनीतिक दल उसे खत्म करने का भरोसा दे पाते हैं तो युवा उनके साथ खड़ा हो सकता है। लेकिन अगर फिर वही पुराने वादे, वही देरी और वही अनिश्चितता दिखाई दी तो इस बार सवाल पूछने वाला युवा शायद चुनावी एजेंडा खुद तय करने की कोशिश करेगा।2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता का फैसला कई मुद्दों से होगा, लेकिन एक बात अब साफ दिखाई दे रही है युवा सिर्फ वोट देने नहीं आएगा, वह अपने भविष्य का हिसाब भी मांगेगा। और जिस दिन शिक्षा, परीक्षा और रोजगार का सवाल चुनावी बहस के केंद्र में आ गया, उस दिन यूपी की राजनीति में युवाओं की भूमिका केवल संख्या की नहीं, दिशा तय करने वाली होगी।
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