तकनीक अपनी जगह, लेकिन गुरु की महिमा अपार
लेखक: डॉ. विनोद यादव ,शिक्षाविद् और इतिहासकार
बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया, ‘असतो मा सद्-गमय’, भारतीय संस्कृति का आदर्श वाक्य है। अर्थात- हे परमेश्वर, हमें बुराई से अच्छाई की ओर ले चलो। वस्तुत: यह ऐसा आह्वान है, जो हमें याद दिलाता है कि आप जो कर रहे हैं, उसका प्रयोजन हरेक प्राणी के कल्याण के लिए है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर दुनिया के तमाम देशों में खूब चर्चा है। एआइ के चमत्कार ने रातोंरात ऐसा तिलिस्म पैदा कर दिया कि दुनिया के विकसित देश खासतौर पर अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया और चीन भी सकते में आ गए। भले ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक एक चुनौती की तरह दिख रही हो, लेकिन इससे संभावनाओं के कई दरवाजे भी खुलते नजर आ रहे हैं।
सनातन संस्कृति की गुरु-शिष्य परंपरा में नैतिकता और सदाचार को सर्वोपरि माना गया है। गुरु श्रद्धा, आस्था और समर्पण का पर्याय है। गीता में कहा गया है- 'श्रद्धावान रहते ज्ञानम् तत्पर: संयतेन्द्रिय... यानी जब एक सच्चे गुरु और श्रद्धावान व अनुशासित शिष्य का समन्वय होता है तो अद्भुत ज्ञान का उदय होता है। गुरु शिक्षा और संस्कार दोनों का केंद्र बिंदु है। अब तकनीक से आंकड़ों की जानकारी मिनटों में मिल सकती है, लेकिन तकनीक संस्कार प्रदान नहीं कर सकती। इसका दुरुपयोग साइबर क्राइम की वजह बन रहा है।
भारतीय परंपरा के ‘गुरु’ को पश्चिमी संस्कृति में ‘गॉड इन ह्यूमन फॉर्म’ कहा गया है। सर्वविदित है कि गूगल के सहारे युवा पीढ़ी में पनप रहे भ्रष्ट आचरण पर लगाम नहीं कसी जा सकती। असलियत में, आत्म-विवेचन, पारस्परिक सहयोग, सौहार्द, बंधुत्व, उदारता, त्याग-भावना आदि मूल्यों को ‘गूगल गुरु’ से प्रस्थापित नहीं किया जा सकता। भारतीय संस्कृति में सद्गुरु की अवधारणा स्पष्ट है। गुरु का अर्थ है- ‘जिसे आत्मा और अविनाशी तत्व का बोध हो जाए।’ सद्गुरु की महिमा व ज्ञान की गरिमा को उजागर करते हुए कबीरदास ने सदियों पहले कहा था कि -‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय’। गुरु एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जो कभी अपने लिए मार्गदर्शक नहीं बनता, अपितु उसकी रोशनी से उसके शिष्यों की मंजिलें आसान होती हैं। गुरु एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जो ज्ञानरूपी प्रकाश भी देता है और प्रेरणा भी, जो मार्ग भी दिखाता है और मंजिल पर भी पहुंचाता है। गुरु पवित्रता का प्रवाह है, गुरु नैतिकता का निर्वाह है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि वह गुरु ही है जो रचनात्मक क्रियाओं व अपने ज्ञान से हमारे अन्त:करण में आनंद उत्पन्न करता है। इस आनंद की अनुभूति में आत्मसात किए गए विषय को शिष्य जीवन-पर्यन्त नहीं भूलता। विश्व-विजेता सिकंदर ने कहा था, ‘अच्छे रहन-सहन के लिए मैं अपने पिता का ऋणी हूं, लेकिन अच्छी तरह से रह पाने के लिए अपने गुरु का। वायुपुराण में गुरु को बहुत सुंदर शब्दों में परिभाषित किया गया है, ‘जो हमें सदबुद्धि दे, हमें संसार में जीना सिखाए, सामाजिक बाधाओं को सहजता से पार करने की कला सिखाए। गूढ़ से गूढ़ बातों को सरलता से समझाए तथा समझाने का तरीका ऐसा हो कि वह बात हृदय में उतर जाए, वही सच्चा गुरु है, वही आचार्य है।’
अत: गुरु के सान्निध्य में जाने से जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल जाती है। सच्चिदानंद स्वरूप गुरु को लोगों के हृदय परिवर्तन के लिए ज्यादा उपदेश नहीं देने पड़ते, उसकी उपस्थिति मात्र से व्यक्तित्व का रूपांतरण हो जाता है। उसकी छोटी सी प्रेरणा हृदय परिवर्तन करने में सक्षम होती है। गौतम बुद्ध को पाटलिपुत्र की नगरवधू आम्रपाली व मगध साम्राज्य में आतंक का पर्याय बन चुके अंगुलिमाल राक्षस का हृदय परिवर्तन करने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। जब तथागत भोजन ग्रहण करने के प्रयोजन के लिए आम्रपाली के द्वार पर पहुंचे तो उनके आभामंडल के प्रभाव से वह इतनी रोमांचित व भावविभोर हो गई कि महल त्यागकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई। अंगुलिमाल के सामने जैसे ही गौतम बुद्ध के मुखारविन्द से यह वाक्य निकला -‘जब पेड़ की शाखा से तोडे़ गए दस पत्तों को तुम यथास्थिति में वापस नहीं जोड़ सकते, फिर भी अपने आप को ताकतवर समझते हो। निर्दोष लोगों की हत्याएं करके अपने आप को बलशाली मानते हो।’ इतना सुनते ही अंगुलिमाल के हाथ कांप उठे, तलवार हाथ से छूटकर जमीन पर गिर पड़ी। यही वह अद्भुत क्षण था, जब अंगुलिमाल के हृदय का रूपांतरण हुआ और वह राक्षस से भिक्षुक बन गया। उसी समय उसने संन्यास ग्रहण कर लिया। आध्यात्मिक मार्ग हो या सांसारिक जीवन सद्गुरु की कृपा से प्रगति सुनिश्चित है।

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